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क्षमा कीजिए महाराजा साहब, आप लोकतंत्र में हैं!

सुभाष मिश्र
गुना से मिली एक खबर इन दिनों चर्चा में है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना दौरे के दौरान गुलाबगंज क्षेत्र में कुछ लोगों ने सडक़ की बदहाली का मुद्दा उनके सामने रखा। सडक़ इतनी खराब है कि लोगों को आने-जाने में परेशानी हो रही है। एक व्यक्ति ने सडक़ के सुधार के लिए आवेदन दिया और साथ ही कहा कि‘इस बार समय से पहले रोड बन जाए, नहीं तो फिर वोट के समय आएंगे तो यहां से कोई भी वोट नहीं डालेगा।’
इतना सुनते ही सिंधिया नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि ‘ये भाषा मेरे साथ कभी उपयोग मत करना। आप आकर निवेदन करो। मेरी जिम्मेदारी है काम करना।’ इस बातचीत का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में है। रिपोर्टों के अनुसार, बाद में सडक़ निर्माण के लिए तीन करोड़ रुपये की राशि की घोषणा भी की गई और मानसून के बाद काम शुरू कराने के निर्देश दिए गए। अजीब बात है कि इसमें कोई भाषा की अभद्रता नहीं थी। जो बात सिंधिया जी को अभद्र लगी, वह एक सामान्य बात थी। सामान्य जन आज भी इसी तरह से बातें करते हैं। गुना और आसपास के लोगों का कहना है कि दरअसल दिक्कत यह है कि राजा-रजवाड़ों के दिन चले गए हैं। लेकिन बीते दिनों के राजाओं के भीतर का कथित घमंड और गुस्सा नहीं गया है। सिंधिया जी की भाषा भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी। उन्होंने कहा कि आप निवेदन करो।

सरकार और खासकर सरकार में बैठे पुराने जमाने के राजाओं को आज भी यह लगता है कि लोग उनके दरबार में आकर निवेदन करें। अपना अधिकार नहीं मांगे जबकि अच्छी रोड़ की मांग करना हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन राजा-महाराजाओं को अधिकार की बात करते लोग अच्छे नहीं लगते हैं। उन्हें आज भी अपने सामने गिड़गिड़ाते हुए लोग पसंद हैं इसीलिए वे लोग कहते हैं कि निवेदन करो।
पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह व्यक्ति अपने लिए यानी निजी रूप से कुछ नहीं मांग रहा था। वह सार्वजनिक समस्या रख रहा था और सार्वजनिक पीड़ा बता रहा था इसलिए उसने भविष्य के परिणाम की बात बताई थी। लेकिन महाराजा को इसमें भाषा की खराबी नजर आई।
इस प्रकरण से पृथक एक बात महत्वपूर्ण है कि राजनीतिज्ञ यह क्यों नहीं समझना चाहते कि समय बदल चुका है। लोग अपने अधिकारों को समझने लगे हैं। उनके गिड़गिड़ाने की आदत खत्म हो रही है। लेकिन ऐसी बातें राजनीतिज्ञों को पसंद नहीं आती है। खासकर राजघराने से आए हुए अधिकांश लोगों को तो बिल्कुल नहीं पसंद आती है। ऐसे लोग अतीत के सामंती हैंगओवर से बाहर नहीं आना चाहते हैं। और उन्हें पता नहीं चलता कि लोकतंत्र में जमाना तेजी से बदल रहा है। एक सामान्य नागरिक के पास कुछ और हो न हो लेकिन वोट की ताकत है। राजनीति में लोगों को यह कहा जा रहा है कि कुछ दिन तो अपने क्षेत्र में गुजारिए। साहब थोड़ा विनम्र होना सीखें। गुस्सा करना छोड़ें। आप लोकतंत्र में है।

लेकिन सवाल सडक़ बनने या न बनने से थोड़ा बड़ा है। सवाल यह है कि आखिर उस नागरिक की भाषा में ऐसा क्या था, जो इतनी आपत्तिजनक हो गई? उसने न कोई गाली दी, न कोई व्यक्तिगत आरोप लगाया। उसने तो बस इतना कहा कि सडक़ नहीं बनी तो अगली बार वोट नहीं देंगे। लोकतंत्र में इससे अधिक सामान्य राजनीतिक भाषा और क्या हो सकती है?
मतदाता अपने वोट का इस्तेमाल किसे करना है और किसे नहीं करना है, यह बताने का अधिकार रखता है। सडक़ अच्छी हो, बिजली मिले, पानी मिले, अस्पताल और स्कूल ठीक हों, इन सबके बदले नागरिक किसी पर एहसान नहीं कर रहा। ये शासन और जनप्रतिनिधियों से उसकी अपेक्षाएं हैं। और चुनाव के समय वही नागरिक अपने मत के जरिए यह तय करता है कि उसकी अपेक्षाएं पूरी हुईं या नहीं।
विडंबना यह है कि नागरिक ने अपने लिए कोई निजी सुविधा नहीं मांगी थी। वह सार्वजनिक सडक़ की समस्या बता रहा था। उसकी पीड़ा व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक थी। उसने भविष्य के चुनाव और वोट का उल्लेख करके मूलत: यह बताया कि जनता विकास के कामों को अपने राजनीतिक निर्णय से जोड़ती है। इसमें धमकी से ज्यादा लोकतांत्रिक चेतावनी है।

लोकतंत्र में नागरिक केवल निवेदन करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अधिकारों वाला नागरिक है। वह मतदाता है। वह करदाता है। वह उस व्यवस्था का आधार है जिसके कारण जनप्रतिनिधि सत्ता तक पहुंचते हैं। राजशाही में प्रजा राजा के सामने फरियाद करती थी। लोकतंत्र में नागरिक प्रतिनिधि के सामने अपनी बात रखता है। फर्क केवल शब्दों का नहीं, पूरी व्यवस्था की बुनियाद का है।
इसलिए क्षमा कीजिए महाराजा साहब, अब आप लोकतंत्र में हैं! आप शायद भूल रहे हैं की इस देश से बहुत पहले ही राजा-महाराजाओं के दिन चले गए। रियासतें खत्म हो गईं।

संविधान ने नागरिक और शासक के बीच के पुराने संबंधों को बदल दिया। अब किसी के सामने गिड़गिड़ाकर अधिकार मांगने की जरूरत नहीं है। जनता अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछ सकती है, जवाब मांग सकती है और अपने वोट से अपना निर्णय सुना सकती है।
सिंधिया परिवार का इतिहास राजघराने से जुड़ा रहा है, यह इतिहास का तथ्य है। लेकिन लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की संवैधानिक भूमिका उसके पारिवारिक अतीत से तय नहीं होती। वह सांसद है, मंत्री है, जनप्रतिनिधि है। और जनप्रतिनिधि होने का अर्थ ही है कि जनता उससे सवाल पूछ सकती है।
राजनीति में सबसे बड़ी भूल तब होती है जब कोई व्यक्ति पद को जनता से ऊपर समझने लगता है। लोकतंत्र का पूरा ढांचा इस धारणा के उलट खड़ा है। यहां नेता समाज से पैदा होते हैं। समाज नेता बनाता है, नेता समाज नहीं बनाता। नेता इतना जरूर कर सकता है कि लोगों को सही दिशा में ले जाए या उन्हें पथभ्रष्ट करे। आज भी हमारे सामने अनेक संकट हैं।

गरीबी है, असमानता है, बेरोजगारी है, सामाजिक तनाव है। आर्थिक विकास की अपनी चुनौतियां हैं। राजनीतिक दलों का चरित्र भी बदल रहा है। कभी समाजवाद भारतीय राजनीति की एक बड़ी धारा था। आज समाजवादी राजनीति अनेक दलों में बिखरी हुई है। कांग्रेस अपने इतिहास में स्वयं को ‘लेफ्ट ऑफ द सेंटर’ कहती रही, लेकिन उसकी वर्तमान राजनीति को लेकर उसके स्वरूप पर बहस होती रही है। दक्षिणपंथी, क्षेत्रीय और विभिन्न सामाजिक आधार वाले दलों का भी अपना प्रभाव है। राजनीति लगातार बदल रही है, लेकिन सामान्य नागरिक की भूमिका खत्म नहीं हुई है। बल्कि नागरिक की भूमिका पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हुई है।

लोकतंत्र की खूबी यही है कि इसमें जनता को अंतिम निर्णय का अधिकार मिलता है। वह किसी सरकार को चुन सकती है, बदल सकती है, सवाल पूछ सकती है और असहमति व्यक्त कर सकती है। लोकतंत्र की कमजोरियां बहुत हैं, लेकिन इसका विकल्प यदि तानाशाही है तो इतिहास उसका परिणाम भी दिखाता है। सत्ता जब सवालों से डरने लगती है तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
भारत ने लोकतंत्र को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में बनाए रखा है। यहां जनता ने सरकारें बदली हैं, नेताओं को सत्ता से बाहर किया है और नए लोगों को मौका दिया है। जनता ने कभी किसी को सिर पर बैठाया तो कभी जमीन पर भी उतारा है। यही लोकतंत्र की ताकत है।
इसलिए किसी नागरिक का यह कहना कि ‘सडक़ नहीं बनी तो वोट नहीं देंगे’ लोकतंत्र के लिए कोई असाधारण घटना नहीं है। यह तो लोकतंत्र की रोजमर्रा की भाषा है। जनता कह रही है काम कीजिए, हम देख रहे हैं। सडक़ बनाइए, हम याद रखेंगे। काम नहीं हुआ तो हम अपना फैसला खुद करेंगे।
राजनीतिज्ञों को इस भाषा से नाराज होने के बजाय इसे समझना चाहिए। लोग बदल गए हैं। वे पहले की तरह हर बात पर हाथ जोडक़र खड़े रहने को तैयार नहीं हैं। मोबाइल ने उनकी दुनिया बदल दी है, सूचना ने उनकी समझ बढ़ाई है और लोकतंत्र ने उन्हें वोट की ताकत दी है। अब नागरिक पूछता है सडक़ कब बनेगी? अस्पताल में डॉक्टर कब आएगा? स्कूल में शिक्षक कब होगा? रोजगार कब मिलेगा? और अगर जवाब नहीं मिला तो वह चुनाव के दिन अपना जवाब देने का अधिकार भी रखता है।
साहब, थोड़ा विनम्र होना सीखिए। गुस्सा करना छोडि़ए। जनता से संवाद कीजिए। क्योंकि आपके सामने खड़ा आदमी आपकी प्रजा नहीं है। वह आपका मतदाता है। और सबसे बड़ी बात वह नागरिक है। क्षमा कीजिए महाराजा साहब, आप लोकतंत्र में हैं!

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