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आस्तिकता और धार्मिक अंधविश्वास के बीच फर्क है

-सुभाष मिश्र

ईश्वर में आस्था मनुष्य की सबसे पुरानी भावनाओं में से एक है। दुख में वह ईश्वर को पुकारता है, सुख में उसका धन्यवाद करता है और संकट में किसी अदृश्य शक्ति के भरोसे अपने मन को संभालता है। शायद यही कारण है कि भजन, गीत, रामकथा, हनुमान भक्ति और देवी-देवताओं से जुड़े संगीत आज भी लोगों के मन को गहराई से छूते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पिछले कुछ वर्षों में आस्था की अभिव्यक्ति का स्वरूप तेजी से बदला है। भक्ति अब केवल मंदिर, पर्व और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रही। वह सिनेमा, संगीत, सोशल मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति का बड़ा हिस्सा बन गई है।
कुछ समय पहले तक धार्मिक फिल्में मुख्यत: पौराणिक आख्यानों पर आधारित होती थीं। जय संतोषी मां, संपूर्ण रामायण, महाभारत और रामायण जैसे धारावाहिकों ने करोड़ों लोगों के मन में श्रद्धा पैदा की, लेकिन दर्शक यह भी समझता था कि वह एक अलग कालखंड की कथा देख रहा है। चमत्कार उसी पौराणिक संसार का हिस्सा थे।
आज की धार्मिक अभिव्यक्ति थोड़ी अलग है। मेरी झोपड़ी में राम आएंगे तो मेरे भाग खुल जाएंगे जैसे गीत हों या हनुमान भक्ति को आधुनिक जीवन के संघर्षों से जोडऩे वाली फिल्में इनमें धर्म के साथ सामाजिक और व्यक्तिगत भावुकता का ऐसा मेल है कि दर्शक उसे सीधे अपने जीवन से जोड़ लेता है। उसे लग सकता है कि जिस तरह फिल्म में ईश्वर ने किसी व्यक्ति की जिंदगी बदल दी, उसी तरह मेरे जीवन में भी अचानक कोई चमत्कार हो सकता है। यहीं आस्तिकता और अंधश्रद्धा के बीच की महीन रेखा दिखाई देती है।
आस्था यदि मनुष्य को भीतर से मजबूत करती है, उसे संकट से लडऩे की शक्ति देती है और कर्म करने का साहस देती है तो वह सकारात्मक शक्ति है। यदि वही आस्था मनुष्य को कर्म से दूर कर दे, उसे भाग्य के भरोसे बैठा दे और यह विश्वास पैदा कर दे कि बिना श्रम के ईश्वर उसकी जिंदगी बदल देगा, तो वह आस्था नहीं, अंधविश्वास की तरफ बढ़ रही है।
धार्मिकता और आधुनिकता भी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कोई व्यक्ति बहुत धार्मिक होते हुए भी वैज्ञानिक सोच वाला, प्रगतिशील और सामाजिक रूप से आधुनिक हो सकता है। धार्मिकता मूलत: व्यक्ति का निजी विश्वास है, जबकि आधुनिकता उसके सामाजिक व्यवहार और सोच से जुड़ी है। समस्या धार्मिक होने में नहीं, धार्मिकता की अति में है। जब व्यक्ति हर सफलता का श्रेय ईश्वर को और हर असफलता का कारण भाग्य को देकर अपने कर्म की जिम्मेदारी से बचने लगता है, तब आस्था यथास्थितिवाद में बदलने लगती है।
भारत में इस मनोविज्ञान को बढ़ाने वाले बाबाओं और चमत्कारों के बाजार की भी कमी नहीं है। लोगों की भावुकता को समझकर उन्हें आसान समाधान का सपना दिखाया जाता है। बीमारी का इलाज, गरीबी से मुक्ति, नौकरी, कारोबार, विवाह—हर समस्या के लिए कोई न कोई चमत्कारी रास्ता सामने खड़ा कर दिया जाता है। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि व्यक्ति अपने संघर्ष की शक्ति खोने लगता है।
यह भी सच है कि आस्था का अपना मनोवैज्ञानिक महत्व है। संकट में एक आस्तिक व्यक्ति मंदिर जाकर माथा टेकता है, प्रार्थना करता है और अपना दुख ईश्वर के सामने रख देता है। समस्या का समाधान हो या न हो, उसके भीतर का तनाव कुछ कम हो सकता है। उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है। यह आस्था की बड़ी मानवीय ताकत है, लेकिन इस ताकत को विवेक से जोडऩा जरूरी है। ईश्वर पर भरोसा कीजिए, लेकिन अपने कर्म पर भरोसा छोड़कर नहीं। प्रार्थना कीजिए, लेकिन प्रयास रोककर नहीं। भाग्य को स्वीकार कीजिए, लेकिन भाग्य के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से भागिए नहीं, क्योंकि ईश्वर में आस्था मनुष्य को खड़ा करने के लिए होनी चाहिए, उसे बैठा देने के लिए नहीं। भक्ति हाथ जोडऩे के साथ-साथ हाथ चलाने की प्रेरणा भी दे तो वह जीवन को बेहतर बनाती है। अगर भक्ति हाथों को काम से रोक दे और आंखों को सिर्फ चमत्कार की प्रतीक्षा में लगा दे, तो वही आस्था धीरे-धीरे अंधश्रद्धा बन जाती है।
धर्म की शक्ति समाज को जोडऩे में है, मनुष्य को संबल देने में है और भीतर से मजबूत बनाने में है, इसलिए आज सबसे ज्यादा जरूरत धर्म से दूर जाने की नहीं, बल्कि धर्म के भीतर विवेक को बचाए रखने की है। आस्तिकता रहे, भक्ति रहे, ईश्वर में विश्वास रहे, लेकिन उसके साथ कर्म, तर्क और जिम्मेदारी भी रहे, क्योंकि जिंदगी बदलने के लिए ईश्वर से प्रार्थना जितनी जरूरी हो सकती है, उतना ही जरूरी है कि प्रार्थना के बाद इंसान खुद उठकर अपने हिस्से का काम करे।

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