रिश्ते की आजादी, मगर स्त्री की कीमत पर नहीं!

लिव-इन रिलेशनशिप की बढ़ती स्वीकार्यता के बीच महिला सुरक्षा, कानूनी जवाबदेही और बच्चों के अधिकारों पर स्पष्ट व्यवस्था जरूरी
–सुभाष मिश्र
समाज में रिश्ते बदल रहे हैं, रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं और विवाह की अनिवार्यता को लेकर भी नई पीढ़ी के भीतर सवाल उठने लगे हैं। कभी विवाह से पहले लड़का-लड़की का एक-दूसरे को देख लेना भी बड़ी बात मानी जाती थी, फिर बातचीत का दौर आया, सगाई के बाद फोटोशूट और वीडियो का चलन शुरू हुआ और अब विवाह किए बिना एक साथ रहने की स्वीकार्यता बढ़ रही है। कल तक जिस लिव-इन रिलेशनशिप की चर्चा महानगरों तक सीमित थी, आज वह छोटे शहरों और कस्बों में भी दिखाई देने लगी है। समाज की इस बदलती तस्वीर के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिश्ते बनाने की आजादी तो मिल रही है, लेकिन यदि रिश्ता टूट जाए तो उसकी कीमत कौन चुकाएगा? क्या अपनी मर्जी से साथ रहने वाली स्त्री को अकेले ही उसके परिणाम भुगतने के लिए छोड़ दिया जाएगा? क्या पुरुष को संबंध बनाने की स्वतंत्रता होगी, लेकिन उससे पैदा होने वाली जिम्मेदारियों से मुकर जाने की भी छूट मिल जाएगी?
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने का समझौता नहीं रहा है। अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेने की परंपरा में परिवार, समाज और रिश्तेदार भी इस बंधन के साक्षी बनते हैं। विवाह के साथ अधिकार और जिम्मेदारियां भी जुड़ती हैं। पहले माता-पिता ही विवाह तय करते थे और कई बार वर-वधू एक-दूसरे को ठीक से देख भी नहीं पाते थे। समय बदला तो विवाह से पहले मिलने और बातचीत करने की छूट मिली। शिक्षा और रोजगार के लिए लड़के-लड़कियों का घर से बाहर निकलना बढ़ा। आर्थिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत पसंद और भावनात्मक निकटता ने संबंधों के नए रास्ते खोले। अब कुछ लोग विवाह से पहले एक-दूसरे को समझने के लिए साथ रहते हैं, जबकि कुछ विवाह संस्था के बाहर ही अपना जीवन बिताना चाहते हैं। वयस्कों की स्वतंत्रता के इस प्रश्न को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को अलग-अलग करके भी नहीं देखा जा सकता।
रायपुर में समान नागरिक संहिता समिति के सामने धरसींवा और गरियाबंद से आई महिला स्व-सहायता समूहों की पदाधिकारियों ने इसी समस्या को उठाया है। उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीयन अनिवार्य करने की मांग की है, ताकि महिलाओं के शोषण पर रोक लगाई जा सके और ऐसे संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को पालन-पोषण तथा उत्तराधिकार के अधिकार मिल सकें। समिति के सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एम.के. राऊत और वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार ने इन सुझावों को गंभीरता से सुनकर रिपोर्ट में शामिल करने का आश्वासन दिया है। महिलाओं ने संपत्ति में समान अधिकार और आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया सरल बनाने जैसे विषय भी उठाए हैं। ये मांगें बताती हैं कि अब चर्चा केवल संबंधों की बदलती प्रकृति की नहीं, बल्कि उनमें महिलाओं की सुरक्षा, समानता और सम्मान की भी है।
लिव-इन रिलेशनशिप में सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है, जब एक महिला किसी पुरुष पर भरोसा करके उसके साथ रहने लगती है और कुछ समय बाद वही पुरुष संबंध से मुकर जाता है। महिला अपना घर, परिवार और सामाजिक सुरक्षा का दायरा छोड़कर उसके साथ रह रही हो, आर्थिक रूप से उस पर निर्भर हो या उसके साथ बच्चा भी हो, तो अलगाव उसके लिए केवल भावनात्मक आघात नहीं रह जाता। उसके सामने रहने की जगह, खर्च, बच्चे की परवरिश और सामाजिक प्रतिष्ठा तक के सवाल खड़े हो जाते हैं। कुछ मामलों में विवाह का झूठा आश्वासन देकर शारीरिक संबंध बनाने, आर्थिक शोषण करने, धमकाने या निजी तस्वीरों और संदेशों के जरिए ब्लैकमेल करने जैसी शिकायतें भी सामने आती हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि किसी संबंध में साथ रहने की सहमति को स्थायी अनुमति नहीं माना जा सकता। सहमति किसी भी समय वापस ली जा सकती है और किसी संबंध में रहने का निर्णय दूसरे व्यक्ति को उसके शरीर, संपत्ति या जीवन पर अधिकार नहीं देता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर लिव-इन संबंध में पुरुष शोषक है या हर संबंध का अंत विवाद में होता है। अनेक वयस्क अपनी इच्छा से ऐसे संबंधों में रहते हैं और आपसी सम्मान के साथ जीवन बिताते हैं, लेकिन कानून और सामाजिक व्यवस्था का दायित्व उन लोगों की रक्षा करना है जो भरोसे के टूटने पर कमजोर स्थिति में पहुंच जाते हैं। महिला सुरक्षा का अर्थ केवल हिंसा के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना भी है, जिसमें महिला को अपने अधिकार साबित करने के लिए वर्षों तक संघर्ष न करना पड़े।
भारत में दो वयस्कों का आपसी सहमति से साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार किया है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत विवाह जैसी प्रकृति वाले कुछ संबंधों में महिलाओं को संरक्षण और अन्य कानूनी राहत मिल सकती है। हर लिव-इन संबंध को स्वतः विवाह का दर्जा नहीं मिलता और न ही प्रत्येक मामले में समान अधिकार अपने आप लागू हो जाते हैं। संबंध की प्रकृति, साथ रहने की परिस्थितियों और संबंधित कानून के प्रावधानों का महत्व होता है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी न्यायिक फैसले आए हैं, लेकिन उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार लागू कानून तथा परिस्थितियों के अनुसार तय होते हैं। देश में लिव-इन संबंधों के पंजीयन की कोई एक समान, सार्वभौमिक अनिवार्य व्यवस्था लागू नहीं है।
ऐसे में महिला स्व-सहायता समूहों की पंजीयन संबंधी मांग पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। पंजीयन की व्यवस्था केवल सरकारी रजिस्टर में नाम दर्ज करने की औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। उसके पीछे महिला को सुरक्षा देने और दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने का उद्देश्य होना चाहिए। यदि ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है तो सबसे पहले दोनों व्यक्तियों की आयु, पहचान और स्वतंत्र सहमति का सत्यापन हो। किसी महिला पर दबाव डालकर या धोखे से पंजीयन न कराया जा सके। पंजीयन के लिए निर्धारित सरकारी प्राधिकरण हो और दर्ज जानकारी गोपनीय रखी जाए। इसकी जानकारी सार्वजनिक करना या परिवार और समाज के सामने उजागर करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे संबंधित व्यक्तियों की निजता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
पंजीयन के समय दोनों पक्षों को उनके कानूनी अधिकारों और जिम्मेदारियों की स्पष्ट जानकारी दी जाए। इसमें साझा खर्च, आर्थिक निर्भरता, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और संबंध समाप्त होने पर उपलब्ध कानूनी उपाय शामिल हों। संबंध समाप्त करने की प्रक्रिया स्पष्ट हो, लेकिन किसी महिला को जबरन साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सके। यदि कोई पक्ष संबंध तोड़ना चाहता है तो दूसरे पक्ष को उसके निर्णय के कारण कैद करके नहीं रखा जा सकता। हां, संबंध के दौरान हुई हिंसा, धोखाधड़ी, धमकी, आर्थिक शोषण या अन्य अपराधों की शिकायत पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। संबंध समाप्त होने के बाद बच्चे की जिम्मेदारी से मुकरने या महिला को आर्थिक संकट में छोड़ देने जैसी स्थितियों से निपटने के लिए भी प्रभावी कानूनी उपाय होने चाहिए।
पंजीयन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा भी होना चाहिए। यदि लिव-इन संबंध से बच्चा जन्म लेता है तो उसके जन्म का पंजीयन, पहचान, पालन-पोषण और लागू कानून के अनुसार उत्तराधिकार के अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। माता-पिता के संबंध का स्वरूप बच्चे के अधिकारों को कमजोर करने का आधार नहीं बनना चाहिए। बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी और आर्थिक सहायता तय करने की प्रभावी प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि संबंध टूटने का दुष्परिणाम बच्चे को न भुगतना पड़े। इसके साथ ही जिला स्तर पर महिलाओं के लिए सहायता केंद्र, निःशुल्क कानूनी परामर्श, जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आश्रय और शिकायतों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था भी आवश्यक है। केवल पंजीयन करा देना सुरक्षा की गारंटी नहीं है; शिकायत पर कार्रवाई और न्याय तक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पंजीयन अपने आप लिव-इन संबंध को विवाह का दर्जा नहीं देगा। यदि ऐसे संबंधों में संपत्ति, भरण-पोषण, अलगाव और अन्य अधिकारों को लेकर विशेष प्रावधान बनाने हैं तो उनके लिए स्पष्ट कानूनी आधार जरूरी होगा। पंजीयन न होने के कारण किसी पीड़ित महिला या बच्चे को न्याय से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य रिश्तों पर निगरानी रखना नहीं, बल्कि शोषण की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध कराना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और कमजोर पक्ष को सुरक्षा देना होना चाहिए।
समान नागरिक संहिता पर विचार करते समय इन सवालों को धर्म, परंपरा और सामाजिक मान्यताओं से आगे बढ़कर न्याय तथा समानता की कसौटी पर परखना होगा। महिला स्व-सहायता समूहों की मांग इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि वे बदलते समाज की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए उसके भीतर सुरक्षा की मांग कर रही हैं। विवाह हो या विवाह से बाहर का संबंध, महिला को कमजोर पक्ष मानकर उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। संपत्ति में समान अधिकार, तलाक की सरल प्रक्रिया और बच्चों के हित जैसे सवाल भी इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं।
समाज में बदलाव को केवल नैतिकता के तराजू पर तौलने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। विवाह संस्था का अपना महत्व है और वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अपना अधिकार। लिव-इन को विवाह का पर्याय मान लेना उचित नहीं। उसके अस्तित्व से इनकार करना भी समस्या का समाधान नहीं है। रिश्ते में प्रवेश करना स्वतंत्रता है, मगर किसी की भावनाओं, शरीर और भविष्य के साथ खिलवाड़ करना स्वतंत्रता नहीं। साथ रहने का निर्णय दो लोगों का हो सकता है, लेकिन उससे पैदा होने वाली जिम्मेदारियों से बच निकलने का अधिकार किसी को नहीं मिल सकता। कानून का उद्देश्य रिश्तों पर पहरा बैठाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि किसी भी संबंध में स्त्री की गरिमा, उसकी सुरक्षा और बच्चे का भविष्य किसी की मनमर्जी के हवाले न हो।


