जनता का गुस्सा चेतावनी है, राजनीति के लिए सबक भी

सुभाष मिश्र
लोकतंत्र में जनता का गुस्सा केवल गुस्सा नहीं होता। वह अक्सर किसी गहरे असंतोष का संकेत होता है, लेकिन हर भीड़ जनमत नहीं होती और हर जनसैलाब आंदोलन नहीं होता। किसी विचार, मांग या अन्याय के खिलाफ संगठित होकर उठी आवाज और किसी घटना को तमाशा समझकर जमा हुई भीड़ के बीच फर्क करना जरूरी है। भीड़ कई बार विवेक खो देती है और आंदोलन का उद्देश्य पीछे छूट जाता है। फिर विरोध, उपद्रव में और प्रतिरोध, हिंसा में बदलने लगता है।
दुष्यंत कुमार ने लिखा था-
“दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों,
तमाशबीन दुकान लगाकर बैठ गए।”
आज के दौर में इस शेर का अर्थ और भी गहरा हो गया है। समाज के भीतर असंतोष है, युवाओं के भीतर बेचैनी है, संस्थाओं के प्रति भरोसे का संकट है और राजनीति के प्रति भी नाराजगी है। इसकी अभिव्यक्ति सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। इस आक्रोश की अभिव्यक्ति जब तर्क और मर्यादा की सीमाएं पार कर देती है तो सवाल केवल आंदोलन के उद्देश्य का नहीं, उसकी दिशा और चरित्र का भी हो जाता है।
नीट जैसी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं का सवाल मामूली राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जिस युवा ने वर्षों तक मेहनत की, परिवार ने अपनी क्षमता से अधिक संसाधन जुटाकर उसे पढ़ाया और जिसने यह भरोसा किया कि परीक्षा उसकी योग्यता का मूल्यांकन करेगी, उसके लिए परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, उसके भविष्य के साथ अन्याय है। इसलिए ऐसे मुद्दे पर आंदोलन होना स्वाभाविक भी है और लोकतांत्रिक अधिकार भी, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार के साथ लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी आती है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा की कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए आंदोलन को भी इसी कसौटी पर देखना होगा। आंदोलन करने वालों की शिकायतें सही हैं या नहीं, उनके पीछे कितने तथ्य हैं और उनके संगठन या पदाधिकारियों पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है। इन सबकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं होते और राजनीतिक विरोध अपने आप में देशविरोध नहीं हो सकता। यदि आंदोलन की आड़ में कानून तोड़ा गया है, हिंसा हुई है या सार्वजनिक व्यवस्था को जानबूझकर चुनौती दी गई है तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इसी संदर्भ में जयपुर के निकट स्कूल को लेकर सामने आया विवाद अधिक गंभीर सवाल खड़े करता है। बताया गया है कि एक संगठन के प्रवक्ता आशुतोष रांका अपनी टीम के साथ एक गांव में स्कूल की स्थिति देखने पहुंचे। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और विवाद बढ़ने के बाद उन पर तथा उनकी टीम पर हमला किया गया। ग्रामीणों की ओर से आरोप लगाया गया कि संगठन गांव के अच्छे स्कूल को बदनाम करने और अराजकता पैदा करने के उद्देश्य से आया था। इन आरोपों की सच्चाई जांच का विषय है, लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन पर हमला हुआ है तो उसे किसी भी तर्क से जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी संगठन से वैचारिक असहमति हो सकती है। उसके राजनीतिक उद्देश्य पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उसके दावों को गलत साबित किया जा सकता है। उसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जा सकता है। लेकिन भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि भीड़ का न्याय अंततः न्याय नहीं होता।
आज अगर किसी संगठन के लोगों को यह कहकर गांव में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है कि वे हमारे राजनीतिक विचारों के नहीं हैं, तो कल यही तर्क किसी दूसरे गांव में किसी दूसरे संगठन के खिलाफ इस्तेमाल होगा। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि उसमें अपने विरोधी को भी बोलने का अधिकार दिया जाता है। किसी को सुनना और उससे सहमत होना दो अलग बातें हैं। असहमति का अर्थ यह नहीं कि दूसरे की आवाज बंद कर दी जाए। यदि ग्रामीणों का यह कथन सही है कि वे भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी दूसरे राजनीतिक संगठन के लोगों को गांव में नहीं आने देंगे तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए और भी चिंताजनक है। भारत का लोकतंत्र केवल दो दलों का लोकतंत्र नहीं है। चुनाव में विकल्प सीमित हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में विचारों के विकल्प कभी सीमित नहीं किए जा सकते। छोटे दल, सामाजिक संगठन, नागरिक समूह और स्वतंत्र नागरिक लोकतंत्र के उतने ही महत्वपूर्ण हिस्से हैं जितने बड़े राजनीतिक दल।
जनता को अधिकार है कि वह किसी को वोट न दे। किसी सभा में न जाए। किसी संगठन का विरोध करे। उसके सवालों का जवाब मांगे। लेकिन किसी को पीटने, धमकाने या जबरन रोकने का अधिकार लोकतंत्र नहीं देता। यहां राजनीति को भी आईना देखने की जरूरत है। आज राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन जनता के बीच जाने को लोकतांत्रिक अधिकार समझते हैं, लेकिन कई बार वे यह भूल जाते हैं कि जनता भी सवाल पूछने का अधिकार रखती है। गांव में जाना केवल झंडा लेकर पहुंच जाना नहीं है। वहां के लोगों की संवेदनशीलता, स्थानीय परिस्थितियों और वास्तविक समस्याओं को समझना भी जरूरी है। किसी स्कूल की स्थिति पर सवाल उठाना है तो तथ्य जुटाइए। बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों से बात कीजिए। प्रशासन के सामने रिपोर्ट रखिए। स्कूल खराब है तो तथ्य सामने आने चाहिए और यदि स्कूल के बारे में गलत आरोप लगाए गए हैं तो आरोप लगाने वालों को भी उसका जवाब देना चाहिए।
हर मुद्दे को राजनीतिक तमाशा बना देने से असली मुद्दा कमजोर होता है। नीट का सवाल भी इसी खतरे से गुजर रहा है। परीक्षा में पारदर्शिता हो, पेपर लीक की जांच हो, दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो और विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हो—इन मांगों पर देश के किसी भी हिस्से का युवा एकजुट हो सकता है। इसे किसी दल या संगठन की राजनीतिक संपत्ति बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। इसी तरह सरकार को भी हर आंदोलन को राजनीतिक षड्यंत्र मानने की मानसिकता से बाहर आना होगा। सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना नहीं है। सरकार से सवाल पूछना राष्ट्रविरोध नहीं है। लेकिन यदि किसी आंदोलन में हिंसा होती है, पुलिस पर हमला होता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है या कानून तोड़ा जाता है तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। कानून की नजर में आंदोलनकारी की राजनीतिक पहचान नहीं, उसका कृत्य महत्वपूर्ण होना चाहिए।
यही बात जयपुर की घटना पर भी लागू होती है। यदि टीम पर हमला हुआ है तो हमलावरों के खिलाफ उसी कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए, जिस कठोरता से किसी आंदोलन में कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जाती है। कानून का राज तभी दिखाई देता है जब उसका तराजू सत्ता, संगठन और भीड़—तीनों के लिए बराबर हो। आज असली संकट आंदोलन का नहीं, आंदोलन की विश्वसनीयता का है। जनता का आक्रोश लोकतंत्र की ताकत हो सकता है, बशर्ते उसे दिशा मिले। वही आक्रोश भीड़ में बदल जाए तो लोकतंत्र की कमजोरी भी बन सकता है। सोशल मीडिया ने इस खतरे को और बढ़ाया है। आधी जानकारी, उत्तेजक वीडियो और राजनीतिक प्रचार कई बार लोगों को तथ्य से पहले फैसला सुनाने के लिए तैयार कर देते हैं। फिर भीड़ जांच नहीं करती, फैसला करती है।
लोकतंत्र में फैसला अदालत करती है, भीड़ नहीं। राजनीति के लिए भी जनता के इस आक्रोश में एक स्पष्ट संदेश छिपा है। केवल नारे, आरोप और उत्तेजना अब पर्याप्त नहीं हैं। जनता पूछ रही है कि मुद्दा क्या है? तथ्य क्या हैं? समाधान क्या है? और आंदोलन करने वालों का अपना आचरण कैसा है? युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा का मंच बनाने के बजाय उन्हें राष्ट्रीय चिंता का विषय बनाना होगा। सरकार को पारदर्शिता देनी होगी, विपक्ष को जिम्मेदार प्रतिरोध करना होगा और समाज को भीड़तंत्र से बचना होगा। आज जरूरत आंदोलन को दबाने की नहीं, आंदोलन की मर्यादा बचाने की है। जरूरत जनता के गुस्से से डरने की नहीं, उसके कारणों को समझने की है। लेकिन जनता के गुस्से को हिंसा में बदलने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती, क्योंकि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन उस आवाज की ताकत उसकी मर्यादा में है।
जनता का गुस्सा सरकारों के लिए चेतावनी है, राजनीतिक दलों के लिए सबक है और समाज के लिए जिम्मेदारी का संदेश भी। यदि इस आक्रोश को तर्क, तथ्य और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की दिशा दी गई तो यही गुस्सा व्यवस्था को सुधार सकता है। लेकिन यदि इसे भीड़, हिंसा और नफरत के हवाले कर दिया गया तो तमाशबीन बढ़ेंगे, दुकानदार लुटेंगे और लोकतंत्र पीछे छूट जाएगा।



