विशेष-जेन जी के समय में आजादी का अर्थ - realtimes
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विशेष-जेन जी के समय में आजादी का अर्थ

सुभाष मिश्र
आजादी की स्मृति भारत में एक गहरी ऐतिहासिक स्मृति है। उसके भीतर रक्त, कारावास, यातना, निर्वासन, भूख, मृत्यु और असंख्य अनाम मनुष्यों के जीवन की आहुतियाँ दर्ज हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए आजादी राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण की घटना तो थी लेकिन वह एक ऐसे भविष्य की कल्पना भी थी जिसमें मनुष्य अपने समय का नागरिक होगा, अपने विवेक का स्वामी होगा और उसके जीवन की गरिमा किसी क्रूर अंग्रेज शासक की कृपा पर निर्भर नहीं रहेगी। इसीलिए स्वतंत्रता आंदोलन का नैतिक आधार उसकी राजनीतिक उपलब्धि से कहीं अधिक व्यापक था।

जेन जी इस इतिहास को एक नई मानसिकता में देखती और पढ़ती है। उनके लिए स्वतंत्रता संग्राम एक गौरवपूर्ण अतीत है, मगर वह अतीत वर्तमान के सामने एक कठिन प्रश्न भी रखता है। जिन लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपना वर्तमान नष्ट किया, उनके उत्तराधिकारियों ने स्वतंत्रता से हासिल भविष्य के साथ क्या किया? यह प्रश्न जेन जी के भीतर इतिहास के प्रति श्रद्धा और वर्तमान के प्रति असंतोष को एक साथ जन्म देता है। जेन जी का आक्रोश इतिहास विरोधी नहीं है। वह इतिहास के अपमान से पैदा हुआ आक्रोश है। भगत सिंह, गांधी, सुभाष, अशफाक उल्ला ख़ाँ, चंद्रशेखर आजाद और असंख्य ज्ञात अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान उनके मन में बहुत गहरे तक है। उनके बलिदान को वह राष्ट्र की नैतिक पूँजी की तरह देखते हैं। इसी नैतिक पूँजी के सामने आज की राजनीति का आचरण उन्हें बेचैन करता है। इतिहास की स्मृति और वर्तमान की राजनीति के बीच जितनी बड़ी दूरी और खाई दिखाई देती है, उतना ही तीखा उनका असंतोष होता जाता है। एक तनाव पैदा होता है जो आगे गुस्से तक जाता है जो राजनीतिक दल इस गुस्से का मर्म या वास्तविक अर्थ समझ लेगा उसके लिए राजनीति और सत्ता का संतुलन साध लेना आसान होगा।

दरअसल यह बेहद कठिन इसलिए है कि जेन जी राजनीति में नैतिकता और आदर्श की माँग रखती है। आज के दौर में राजनीतिज्ञ के लिए आदर्श और नैतिकता बनाए रखना या नए सिरे से पैदा करना बहुत कठिन काम हो गया है। उनकी पूरी चारित्रिक बनावट नए सिरे से होगी जो राजनीति में गले-गले तक धँस गए व्यक्ति के लिए बेहद कठिन है। जेन जी के लिए आजादी का अर्थ एक नए विमर्श में प्रवेश करना है। जेन जी के लिए आजादी एक ऐतिहासिक तारीख की स्मृति से आगे बढक़र रोजमर्रा के जीवन का प्रश्न है। वह पूछती है कि नागरिक अपने ही देश में कितना स्वतंत्र अनुभव करता है। वह अपने विचार व्यक्त करते हुए कितना निर्भीक रह सकता है। संस्थाएं उसके प्रति कितनी जवाबदेह हैं। सत्ता से प्रश्न पूछने की उसकी क्षमता और अधिकार कितने सुरक्षित हैं। उसके श्रम, उसकी प्रतिभा और उसके भविष्य के साथ व्यवस्था का व्यवहार कैसा है। युवाओं के भविष्य के लिए राजनीति इतनी असावधान और लापरवाह क्यों है ? इन प्रश्नों का कोई सरल राजनीतिक उत्तर नहीं है, क्योंकि इनके भीतर नागरिकता की पूरी संरचना की जाँच छिपी हुई है।

यहीं जेन जी की मानसिकता परंपरागत राष्ट्रवादी आख्यान से अलग दिखाई देती है। राष्ट्र उसके लिए केवल भूगोल नहीं है। राष्ट्र एक जीवित सार्वजनिक अनुभव है। तिरंगा, संविधान, स्वतंत्रता दिवस और स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियां उसके सांस्कृतिक मानस का हिस्सा हैं, मगर इन प्रतीकों की सार्थकता वर्तमान संस्थाओं के व्यवहार से तय होती है। राष्ट्रीय ध्वज के सामने खड़ा युवा उसी क्षण अपने आसपास की सामाजिक विषमता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक उदासीनता को भी देख रहा है। उसके भीतर राष्ट्र का भाव और व्यवस्था पर प्रश्न एक साथ हैं। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी बेचैनी शायद सत्ता की भाषा को लेकर है। सत्ता कभी लोकसेवा का माध्यम थी, ऐसी कल्पना लोकतांत्रिक आदर्शों में की गई थी। आज सत्ता का सार्वजनिक प्रदर्शन कई बार शक्ति के प्रदर्शन में बदलता हुआ दिखाई देता है। पद, सुरक्षा, प्रोटोकॉल, राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक सामर्थ्य और संस्थागत पहुँच एक ऐसी दृश्य संस्कृति निर्मित करते हैं जिसमें नागरिक और शासक के बीच दूरी बढ़ती गई है। सत्ता की भाषा में विनम्रता का गुम होना या नष्ट होना जेन जी को विशेष रूप से दिखाई देता है,और इस बात से उन्हें बहुत कष्ट होता है क्योंकि उसका अपना सामाजिक संसार अधिक संवादात्मक और सामाजिक पक्षधरता का है। वह दम्भी आदेश की भाषा से असहज होती है। वह संवाद की भाषा चाहती है। डिजिटल युग ने इस मानसिकता को और तल्ख बनाया है। जेन जी ने सूचना को सत्ता के एकाधिकार में नहीं देखा। उसके हाथ में मोबाइल है, उसके सामने अनेक स्रोत हैं, वह घटनाओं को रिकॉर्ड कर सकता है, साझा कर सकता है, प्रश्न कर सकता है और सत्ता के आधिकारिक बयानों, भाषणों और सूचनाओं के समानांतर अपना आख्यान निर्मित कर सकता है। सत्ता की पारंपरिक छवि के सामने नागरिक की नई छवि खड़ी हो गई है। कैमरा अब केवल राज्य के हाथ में नहीं है। नागरिक भी देख रहा है, दर्ज कर रहा है और सार्वजनिक कर रहा है।

यहीं से भ्रष्टाचार का प्रश्न भी अपना अर्थ बदलता है। पुरानी राजनीतिक भाषा में भ्रष्टाचार को अक्सर व्यवस्था की किसी विकृति के रूप में समझाया गया था जो धीरे-धीरे इतना सामान्य हो गया कि उससे भ्रष्ट नेता के लिए अपमान बोध भी खत्म हो गया। जेन जी ऐसी तमाम हरकतों को व्यवस्था की कार्यप्रणाली में घुली हुई ऐसी प्रवृत्ति के रूप में देखती है जो सामान्य सामाजिक व्यवहार में सहज और स्वीकृत हो रही है। जब भ्रष्टाचार पर आश्चर्य समाप्त हो जाता है, तब समस्या केवल आर्थिक नहीं रहती है। वह नैतिक संवेदना के नष्ट होने का संकेत है। रिश्वत, राजनीतिक संरक्षण, पद का दुरुपयोग और सार्वजनिक संसाधनों पर निजी अधिकार की आकांक्षा उस समय अधिक भयावह लगती है जब राजनीति के साथ ही समाज इन्हें जीवन की सामान्य हरकतें मानने लगता है।

चरित्र का प्रश्न भी इसी संदर्भ में सामने आता है। राजनीति में चरित्र शब्द कभी सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण कसौटी हुआ करता था। यह शब्द किसी समय व्यक्ति के जीवन में मान अपमान और सामाजिक हैसियत से जुड़ा था। आज उसके स्थान पर सफलता, प्रभाव, चुनावी गणित और सत्ता प्राप्त करने की धूर्तता अधिक है। जेन जी के लिए यह परिवर्तन गहरी बेचैनी का कारण है। वह उस नैतिक विसंगति को पहचानती है जिसमें सार्वजनिक जीवन में आदर्शों की गुंजाइश बनी रहती है लेकिन निजी तथा राजनीतिक आचरण उन आदर्शों को लगातार निष्प्रभावी करता रहता है। इस पीढ़ी का द्वंद्व यहीं सबसे तीखा है। वह स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करती है और वर्तमान राजनीति से आक्रोशित रहती है। वह संविधान को महत्वपूर्ण मानती है और संस्थाओं पर प्रश्न उठाती है। वह राष्ट्र से भावनात्मक रूप से जुड़ी रहती है और राष्ट्र की वर्तमान दशा पर कठोर टिप्पणी करती है। वह लोकतंत्र को आवश्यक समझती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरियों को लेकर बेचैन है। इन विरोधाभासों को समझे बिना जेन जी को समझना कठिन है। यह विरोधाभास दरअसल उसकी राजनीतिक परिपक्वता का संकेत भी है, क्योंकि वह किसी बने बनाए राजनीतिक साँचे को राजनीति की अनिवार्यता नहीं मानती है। जेन जी के लिए यह सार्वजनिक जीवन की पहली और अंतिम शर्त और अनिवार्यता नहीं है।

जेन जी के लिए आजादी का एक अर्थ मानसिक आजादी भी है। वह inherited opinions, अर्थात विरासत में मिले विचारों को अंतिम सत्य की तरह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। परिवार, समाज, राजनीतिक दल, धर्म, जाति, परंपरा और संस्थागत प्रतिष्ठा, सब उसके प्रश्नों के घेरे में हैं। वह अपने समय को स्वयं समझना चाहती है। इसी कारण उसकी भाषा में असहमति अधिक है, उसकी प्रतिक्रियाओं में तीव्रता अधिक है और उसके प्रश्नों में अधैर्य और कभी-कभी तल्खी भी दिखाई देती है। यह अधैर्य उस पीढ़ी की कमजोरी नहीं है। इसके भीतर समय को तेजी से बदलते हुए देखने का अनुभव भी है। स्वतंत्रता दिवस उसके लिए इसलिए एक दिलचस्प सांस्कृतिक अवसर है। एक तरफ राष्ट्रगान है, तिरंगा है, स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति है और बलिदान की गौरवगाथा है। दूसरी तरफ वही युवा अपने समय की सत्ता की बनावट को देखता है। समारोह और वास्तविकता के बीच की दूरी उसकी दृष्टि से छिपी नहीं है। वह पूछता है कि जिन लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, क्या वे उस राजनीतिक संस्कृति की कल्पना कर सकते थे जिसमें सत्ता स्वयं नागरिक में भय पैदा करने लगे? क्या उन्होंने ऐसी राजनीति के लिए बलिदान दिया था जिसमें सार्वजनिक जीवन का नैतिक अनुशासन लगातार कमजोर होता जाए? यह प्रश्न किसी एक दल, एक नेता या एक सरकार तक सीमित नहीं है। जेन जी के आक्रोश का वास्तविक लक्ष्य राजनीतिक संस्कृति है। उसके सामने सत्ता के चरित्र का प्रश्न है। वह सत्ता नहीं, सत्ता का चरित्र बदलना चाहती है। वह सत्ता को नागरिक जीवन की नियामक शक्ति के रूप में देखती है और इसलिए उससे जवाबदेही की माँग करती है। लोकतंत्र की उसकी कल्पना में नागरिक दर्शक नहीं है। वह सहभागी है, प्रश्नकर्ता है और सार्वजनिक जीवन का सक्रिय नैतिक निरीक्षक भी है।

शायद इसी कारण जेन जी के लिए आजादी की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति स्वतंत्रता सेनानियों की मृत्यु नहीं, उनके सपनों की जीवित उपस्थिति है। बलिदान का सम्मान स्मारकों, भाषणों और समारोहों में सुरक्षित रह सकता है, मगर उसकी वास्तविक परीक्षा नागरिक जीवन में होती है। जब कोई युवा सत्ता से प्रश्न करता है, भ्रष्टाचार को स्वीकार करने से इनकार करता है, राजनीतिक दम्भ पर असहमति व्यक्त करता है और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहता है, तब स्वतंत्रता की ऐतिहासिक स्मृति वर्तमान में सक्रिय होती है। आजादी की यह नई व्याख्या भारतीय लोकतंत्र के सामने एक कठिन दर्पण रखती है। उसमें केवल अतीत का गौरव दिखाई नहीं देता। उसमें वर्तमान की विसंगतियां और दरारें भी दिखाई देती हैं। जेन जी उस दर्पण को हटाने के बजाय उसके सामने खड़ी है। उसका आक्रोश उसी दृश्य से पैदा होता है। उसकी बेचैनी उसी दूरी से पैदा होती है जो स्वतंत्रता के स्वप्न और आज के सार्वजनिक जीवन के बीच है। उसकी आकांक्षा उस दूरी को कम करने की है।

इस अर्थ में जेन जी की आजादी एक unfinished project, अर्थात अधूरी परियोजना है। स्वतंत्रता 1947 में इतिहास की एक निर्णायक उपलब्धि बनी थी। उसके सामाजिक, नैतिक और नागरिक परिणाम प्रत्येक पीढ़ी में नए सिरे से निर्मित होते हैं। जेन जी उसी निर्माण प्रक्रिया में अपने प्रश्न लेकर उपस्थित है। उसके प्रश्न तीखे हैं, कभी असुविधाजनक हैं, कभी अधीर हैं,लेकिन प्राय: गलत नहीं है। उनके भीतर एक ऐसी आकांक्षा मौजूद है जिसमें स्वतंत्रता केवल अतीत की विरासत नहीं रहती। वह वर्तमान को जवाबदेह बनाने वाली जीवित चेतना है और शायद आजादी का सबसे बड़ा अर्थ यही है कि कोई पीढ़ी अपने पूर्वजों के बलिदान को श्रद्धांजलि देकर आगे बढ़े और फिर उसी श्रद्धांजलि की नैतिक रोशनी में अपने समय से पूछे कि हमने इस स्वतंत्रता के साथ क्या किया। जेन जी का प्रश्न मूलत: यही है। वह स्वतंत्रता सेनानियों से असहमत नहीं है। वह उनके अधूरे स्वप्न की उत्तराधिकारी है और वर्तमान से उसका हिसाब माँग रही है।

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