मानसून के जाते ही बिजली की खपत ने दिखाए गर्मी वाले तेवर - realtimes
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मानसून के जाते ही बिजली की खपत ने दिखाए गर्मी वाले तेवर

रायपुर(realtimes) प्रदेश से मानसून की विदाई के बाद जहां एक तरफ पारी गर्मी वाले तेवर दिखाने लगा है, वहीं बिजली की खपत भी आसमान पर जा रही है। बारिश न होने के कारण अचानक उमस बढ़ने के कारण एसी और कूलरों के चलने से बिजली की खपत बढ़ गई है। इस समय खपत पांच हजार मेगावाट पार हो गई है। ऐसे समय में कोरबा के बिजली संयंत्रों में पूरा उत्पादन नहीं हो रहा है। अभी दो यूनिट बंद है। एक यूनिट 210 मेगावाट की और एक यूनिट 250 मेगावाट की। यही वजह है कि बिजली की पूर्ति करने के लिए जहां बांगों की 40 मेगावाट की पानी वाली तीनों यूनिटों को दिन में चलाना पड़ रहा है वहीं सेंट्रल सेक्टर भी 27 से 28 सौ मेगावाट बिजली लेनी पड़ रही है।

मानसून की विदाई के बाद बारिश पर विराम लग गया है। बारिश बंद होने के बाद दिन का पारा आसमान पर जा रहा है। यही वजह है कि दिन में बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है। आज सुबह ही खपत 52 साै मेगावाट तक पहुंच गई थी। एक दिन पहले भी सुबह काे खपत 51 साै मेगावाट से ज्यादा थी। हालांकि इसके बाद खपत में सौ-दो सौ मेगावाट की कमी आई, लेकिन शाम को पीक आवर में एक बार फिर से खपत पांच हजार मेगावाट के पार चली गई। शाम के समय उद्योग भी चलने लगते हैं।
अपना उत्पादन घटा
कोरबा वेस्ट में 210 मेगावाट के चार और एक 500 मेगावाट का संयंत्र है। इसमें से 210 मेगावाट की एक यूनिट अब तक बंद है। कुछ दिनों पहले यहां पर 210 मेगावाट की तीन यूनिट बंद हो गई थी। दो यूनिट को प्रारंभ कर लिया गया है, लेकिन इधर पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी संयंत्र में 250 मेगावाट की एक यूनिट बंद हो गई है। इस समय अपना उत्पादन 22 सौ मेगावाट हो रहा है, वो भी तब की स्थिति में जबकि बांगों की पानी से बिजली का उत्पादन करने वाली 40 मेगावाट की तीनों यूनिट चलाई जा रही है।
सेंट्रल सेक्टर का सहारा
अपना उत्पादन कम होने के कारण सेंट्रल सेक्टर से अलग-अलग समय में जरूरत के हिसाब से बिजली ली जा रही है। यहां से गुरुवार को दिन में 28 सौ मेगावाट बिजली लेनी पड़ रही थी। शाम को पीक आवर में भी 27 से 28 सौ मेगावाट बिजली लेने की जरूरत पड़ी। सेंट्रल सेक्टर से अपना शेयर तीन हजार मेगावाट का है। लेकिन इसके लिए भी पैसे देने पड़ते हैं। पावर कंपनी का अपना उत्पादन जितना होता है, उससे बाद जितनी बिजली की जरूरत पड़ती है, वह या तो सेंट्रल सेक्टर से ली जाती है या फिर दूसरे राज्यों से एक्सचेंज में लेते हैं। अपने राज्य के निजी उत्पादकों से भी बिजली खरीदी जाती है।

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