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छत्तीसगढ़ में अब खस की खेती, धान से अधिक मुनाफा

छत्तीसगढ़ में “वेटिवर फार्मिंग टेक्नोलॉजी” पर एक दिवसीय कार्यशाला

रायपुर: छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा आज रायपुर स्थित बोर्ड कार्यालय के सभागार में “वेटिवर फार्मिंग टेक्नोलॉजी” पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने की, वहीं संचालन बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे.ए.सी.एस. राव के मार्गदर्शन में हुआ।

कार्यशाला में सीमैप लखनऊ के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. अनूप कालरा और सीमैप बैंगलोर के वैज्ञानिक डॉ. वी. सुन्देशरन ने वेटिवर (खस घास) की खेती, इसके पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों पर विस्तार से जानकारी दी।

वेटिवर की विशेषताएं और लाभ:

  • डॉ. कालरा ने बताया कि वेटिवर एक ऐसा पौधा है जो हर प्रकार की जलवायु में जीवित रह सकता है। यह वर्षा जल को समेटने और मिट्टी के कटाव को रोकने में बेहद सक्षम है।
  • यह घास सूखा, कीट और जल प्रतिरोधी होती है, जिससे यह जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में सहायक है।
  • वेटिवर की जड़ें एक वर्ष में 1 से 4 मीटर तक गहराई में फैल सकती हैं। इससे यह भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने में मदद करती है।

तेल उत्पादन और व्यावसायिक संभावनाएं:

  • वेटिवर की सूखी जड़ों से निकलने वाला तेल “खस तेल” के नाम से जाना जाता है, जिसकी बाजार में भारी मांग है।
  • एक एकड़ भूमि से 1.5 टन सूखी जड़ें प्राप्त होती हैं, जिनसे लगभग 1.5 किलोग्राम तेल निकाला जा सकता है।
  • इस तेल की कीमत ₹15,000 से ₹20,000 प्रति लीटर तक है, जो किसानों के लिए इसे एक लाभदायक फसल बनाता है।

वेटिवर खेती के प्रमुख लाभ:

  1. आर्थिक रूप से लाभकारी – कम निवेश में अधिक लाभ।
  2. कम जल की आवश्यकता – असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
  3. प्राकृतिक तेल उत्पादन – कोई सिंथेटिक तत्व नहीं।
  4. सरल खेती तकनीक – खाद व उर्वरक की आवश्यकता नहीं।
  5. उद्योगों में उच्च मांग – परफ्यूम, साबुन, औषधियों और सौंदर्य प्रसाधनों में उपयोग।
  6. घरेलू व लघु उद्योगों में उपयोग – चटाई, टोकरियां, खिड़की आवरण, छप्पर निर्माण आदि।
  7. औषधीय गुण – तंत्रिका, रक्त संचार और पेट दर्द की समस्याओं में लाभकारी।

विकास मरकाम ने कहा कि राज्य में वेटिवर जैसे औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देकर न सिर्फ पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है बल्कि ग्रामीण और आदिवासी किसानों की आय भी बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि औषधीय पौधों के बाजार मूल्य से आम जनता को अवगत कराया जाए और उन्हें इन पौधों के संरक्षण, संवर्धन व कृषिकरण से जोड़ा जाए।

इस अवसर पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे.ए.सी.एस. राव सहित बोर्ड के अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।

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