
वर्दराजन ने इस मुद्दे को उठाया कि जुबैर को पहले तो धार्मिक वैमनस्यता बढ़ाने की धारा 153 ए और धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए उद्देश्य से धर्मस्थल को नुकसान पहुंचाने की धारा 295 के तहत गिरफ्तार किया गया। लेकिन इसके बाद उनके खिलाफ अन्य धाराएं भी लगा दी गईं। वह भी एक ऐसे ट्वीट के लिए जो उन्होंने 2018 में किया था। वर्दराजन ने आगे कहा कि यह एक पैटर्न है जिससे सामने आता है कि सरकार पत्रकारों और खासतौर से मुस्लिम पत्रकारों को निशाना बना रही है।
हालांकि जुबैर पर धारा 153ए और धारा 295 नहीं लगाई जा सकती क्योंकि सीआरपीसी की धारा 468 में प्रावधान है कि अधिकतम तीन साल की सजा इन आरोपों में दी जा सकती है और न ही अदालतें इस मामले का तीन साल के बाद संज्ञान ले सकती हैं। ऐसे मामलों में लागू होने वाली सीमाओं का एक क़ानून है।
इस विषय में बिहार सरकार बनाम अर्नेश कुमार के 2014 के केस में एक जजमेंट है, जिसके मुताबिक जुबैर को पहले नोटिस दिया जाना चाहिए था, और जैसा कि उनका कहना है यह नोटिस जुबैर को नहीं दिया गया। लेकिन रिमांड ऑर्डर में कहा गया है कि नोटिस दिया गया था।



