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जम्मू-कश्मीर में तीन दशकों बाद फिर खुला शारदा भवानी मंदिर, मुस्लिम समुदाय की रही बड़ी भागीदारी

कश्मीरी पंडित समुदाय (Kashmiri Pandit Community) ने रविवार को जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) के बडगाम जिले (Budgam district) में शारदा भवानी मंदिर (Sharda Bhavani Temple) को तीन दशकों से भी ज्यादा समय बाद फिर से खोल दिया। इस समारोह में स्थानीय मुस्लिम समुदाय की भारी भागीदारी रही। मध्य कश्मीर जिले के इचकूट गांव में ‘मुहूर्त’ और ‘प्राण प्रतिष्ठा’ के साथ आयोजित इस समारोह में कश्मीरी पंडित परिवारों का एक ग्रुप 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर घाटी में उग्रवाद भड़कने के बाद पहली बार अपने पैतृक स्थान पर लौटा। इस दौरान एक मुस्लिम बुजुर्ग ने कहा कि कश्मीर घाटी कश्मीरी पंडितों की जन्मभूमि है और दोनों समुदाय साथ-साथ पले-बढ़े हैं।

बडगाम स्थित शारदा स्थापना समुदाय के अध्यक्ष सुनील कुमार भट्ट ने कहा, “हम कह सकते हैं कि यह पाकिस्तान स्थित शारदा माता मंदिर की एक शाखा है। हम लंबे समय से इस मंदिर को फिर से खोलना चाहते थे। स्थानीय मुसलमान भी यही चाहते थे। वे हमें नियमित रूप से आकर मंदिर की पुनर्स्थापना करने के लिए कहते थे।”

उन्होंने कहा कि पंडित समुदाय ने 35 साल बाद मंदिर को फिर से खोला है। उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि यह (सभा) एक वार्षिक आयोजन होगा और हम माता रानी से प्रार्थना करते हैं कि समुदाय के सदस्य जल्द ही कश्मीर लौट आएं।” भट्ट ने कहा कि कुछ कश्मीरी पंडितों ने, जिनमें से ज्यादातर प्रधानमंत्री पैकेज के तहत काम कर रहे हैं, मंदिर का पुनर्निर्माण किया है और पुराने मंदिर के खंडहर हो जाने के कारण, उन्होंने जिला प्रशासन से एक नए मंदिर के निर्माण के लिए संपर्क किया है।

उन्होंने कहा, “हम निर्माण की योजना बना रहे हैं। हमने वहां एक शिवलिंग स्थापित किया है जो हमें इस जगह की सफाई और जीर्णोद्धार के दौरान मिला था।” समारोह में घाटी की प्रसिद्ध मिश्रित संस्कृति की झलक दिखाई दी क्योंकि स्थानीय मुसलमान भी इस समारोह में शामिल हुए। भट्ट ने कहा, “स्थानीय समुदाय के बिना, यह संभव नहीं होता।” उन्होंने आगे कहा कि उनका समर्थन बहुत बड़ा है।

उन्होंने कहा, “जब हम यहां आए थे, तब हम सिर्फ चार लोग थे। आज पूरा गांव हमारे साथ है। यह स्थानीय समुदाय के समर्थन को दर्शाता है।” एक बुज़ुर्ग स्थानीय मुसलमान ने कहा कि पंडित समुदाय का अपनी जड़ों की ओर लौटने पर हार्दिक स्वागत है। उन्होंने कहा, “ये लोग इसी गांव के निवासी हैं। हालात बिगड़ने से पहले हम साथ रहते और खाते-पीते थे। अगर उन्हें किसी चीज की जरूरत होती है, तो हम उनकी मदद के लिए मौजूद हैं।”

उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी पंडितों की ‘जन्मभूमि’ है और दोनों समुदायों के लोग साथ-साथ पले-बढ़े हैं। उन्होंने कहा, “हम साथ बिताए पलों को कैसे भूल सकते हैं? हमें खुशी है कि वे यहां आए और प्रार्थना की। यह उनकी आस्था का मामला है।”

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