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अंतरिक्ष में भारत ने फिर रचा इतिहास

  • अंतरिक्ष से पृथ्वी की करेगा निगरानी
  • घने जंगल और अंधेरे में भी देखने की क्षमता

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आज निसार (नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार) मिशन का प्रक्षेपण किया गया। ये रॉकेट निसार को 743 किलोमीटर की ऊंचाई पर सूरज के साथ तालमेल वाली सन-सिंक्रोनस कक्षा में स्थापित करेगा, जिसका झुकाव 98.4 डिग्री होगा।  इस सैटेलाइट को नासा और इसरो दोनों ने मिलकर बनाया है। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र बुधवार शाम 5:40 बजे निसार को जीएसएलवी-एस16 रॉकेट के जरिये लॉन्च किया गया। यह पहला ऐसा मिशन है जिसमें पहली बार किसी जीएसएलवी रॉकेट के जरिये ऐसे उपग्रह को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (सूर्य-स्थिर कक्ष) में स्थापित किया जाएगा।सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट वह कक्षा होती है, जिसमें उपग्रह पृथ्वी के ध्रुवों के ऊपर से गुजरता है और हर बार जब वह एक विशेष स्थान से गुजरता है तो सूरज की रोशनी की स्थिति एक जैसी रहती है। कावुलुरू ने मिशन के बारे में बताया कि नासा ने निसार के लिए एल-बैंड उपलब्ध कराया है जबकि इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार के लिए एस-बैंड उपलब्ध कराया है। इससे बड़ी मात्रा में डाटा एकत्र करना संभव हो पाएगा। यह उपग्रह अंटार्कटिका, उत्तरी ध्रुव और महासागरों सहित पृथ्वी से संबंधित व्यापक डाटा प्रसारित करेगा। 

कावुलुरू ने बताया कि निसार पूरे विश्व से डाटा एकत्र करेगा और इसका इस्तेमाल व्यावसायिक तथा वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।कवुलुरु ने कहा, इसरो इस डाटा का प्रसंस्करण करेगा और इसका अधिकांश हिस्सा ओपन-सोर्स के रूप में उपलब्ध कराएगा, ताकि दुनिया भर के उपयोगकर्ता इसे आसानी से प्राप्त कर सकें। इससे हम हिमालय और अंटार्कटिका जैसे क्षेत्रों में वनों में होने वाले बदलाव, पर्वतों की स्थिति या स्थान में बदलाव और ग्लेशियरों की गतिविधियों सहित मौसमी परिवर्तनों की निगरानी कर सकेंगे। जीएसएलवी-एस16 रॉकेट की लंबाई 51.7 मीटर है। यह चेन्नई से लगभग 135 किलोमीटर पूर्व में स्थित दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपित होगा। प्रक्षेपण के लगभग 19 मिनट बाद उपग्रह को उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित कर दिए जाने की संभावना है।

इसरो के मुताबिक, नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (निसार) उपग्रह का प्रक्षेपण दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच एक दशक से अधिक लंबे सहयोग में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा। इसरो ने बताया कि यह उपग्रह हर 12 दिनों में पूरी पृथ्वी का स्कैन करेगा, और दिन-रात, हर मौसम में उच्च-रिजॉल्यूशन वाला डेटा प्रदान करेगा। उपग्रह पृथ्वी की सतह पर अत्यंत सूक्ष्म बदलावों की पहचान करने में सक्षम होगा, जैसे वनस्पति में बदलाव, बर्फ की चादरों का खिसकना और जमीन का विकृति (डिफॉर्मेशन)। इसरो ने कहा कि इस मिशन से समुद्र के स्तर की निगरानी, जहाजों का पता लगाना, तूफानों पर नजर रखना, मिट्टी की नमी में बदलाव, सतही जल संसाधनों की मैपिंग और आपदा प्रबंधन जैसे कई अहम क्षेत्रों में मदद मिलेगी। यह उपग्रह भूकंप से जमीन में आई हल्की दरारें या बर्फ की चादर में बदलाव का पता लगाएगा। 

जीएसएलवी-एफ18 इस उपग्रह को 743 किलोमीटर ऊंचे सन-साइक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित करेगा। जिसका झुकाव 98.40 डिग्री होगा। निसार धरती की निगरानी करने वाला दुनिया का पहला उपग्रह है। इसमें दो अलग अलग बैंड (नासा का छ-बैंड और इसरो का र-बैंड वाले) के रडार हैं। जिसके कारण वह घने जंगलों के नीचे से भी डेटा एकत्र करने में सक्षम होगा। इसरो प्रमुख ने बताया कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपग्रह है। इसके दो प्रमुख पेलोड हैं: एक एस-बैंड पेलोड है। जिसे इसरो ने पूरी तरह से अपने अहमदाबाद लैब में विकसित किया है और दूसरा- जेपीएल अमेरिका द्वारा विकसित एल-बैंड पेलोड। दोनों पेलोड को एक उपग्रह में संयोजित और एकीकृत किया गया है।

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