यह सूचना समर है – Aaj Ki Jandhara

सुभाष मिश्र
पहले युद्ध तलवारों से लड़े जाते थे। फिर बंदूकें आईं, फिर टैंक और मिसाइलें। लेकिन इक्कीसवीं सदी ने युद्ध का एक नया हथियार दुनिया को दिया है- सूचना। आज किसी देश को अस्थिर करने के लिए हमेशा सीमा पर सैनिक भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। एक वायरल वीडियो, एक झूठा संदेश, एक भ्रामक तस्वीर या एक सुनियोजित डिजिटल अभियान भी समाज को बांट सकता है, सरकारों को कठघरे में खड़ा कर सकता है और करोड़ों लोगों की सोच को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि सोशल मीडिया अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि लोकतंत्र का नया रणक्षेत्र बन चुका है।
एक समय था जब अखबार जनमत बनाते थे, रेडियो सूचना देता था और टेलीविजन बहस का मंच होता था। फिर इंटरनेट आया और उसके साथ सोशल मीडिया। शुरुआत में लगा कि यह अभिव्यक्ति की सबसे बड़ी क्रांति है। अब हर नागरिक के हाथ में अपना मंच होगा। वह बिना किसी संपादक, बिना किसी प्रसारण केंद्र और बिना किसी बड़ी पूंजी के अपनी बात पूरी दुनिया तक पहुंचा सकेगा। यह उम्मीद गलत भी नहीं थी। सोशल मीडिया ने लाखों लोगों को आवाज दी, सत्ता से सवाल पूछने का साहस दिया और सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन हर तकनीक की तरह इसका दूसरा चेहरा भी धीरे-धीरे सामने आया।
आज सोशल मीडिया केवल सूचना नहीं देता, सूचना की दिशा भी तय करता है। वह केवल खबर नहीं दिखाता, यह भी तय करता है कि कौन-सी खबर लाखों लोगों तक पहुंचेगी और कौन-सी भीड़ में खो जाएगी। पहले अखबार का संपादक पहले पन्ने का फैसला करता था, आज यह काम एल्गोरिद्म कर रहा है। हम समझते हैं कि हम अपनी पसंद की सामग्री देख रहे हैं, जबकि कई बार हमारी पसंद पहले ही तय की जा चुकी होती है। यही एल्गोरिद्म की असली ताकत है और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती भी।
दुनिया ने इसका असर कई बार देखा है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-हमास संघर्ष, युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लड़ा गया। वीडियो, तस्वीरें, दावे, प्रतिदावे और डिजिटल प्रचार भी युद्ध का हिस्सा बने। कई बार असली तस्वीरों से ज्यादा नकली तस्वीरें वायरल हुईं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। डीपफेक वीडियो और बदली हुई आवाजें अब सच और झूठ के बीच की रेखा को धुंधला कर रही हैं। अब आंखों देखा भी अंतिम सच नहीं रह गया। हर दृश्य की पुष्टि करनी पड़ती है।
भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं है। 2014 का चुनाव डिजिटल राजनीति का नया अध्याय लेकर आया। राजनीतिक दलों ने समझ लिया कि मोबाइल की स्क्रीन पर कब्जा करना भी चुनाव जीतने की रणनीति का हिस्सा है। 2019 तक आते-आते व्हाट्सएप गांव-गांव की चौपाल बन चुका था। लाखों समूहों में सूचनाएं, अफवाहें, प्रचार और प्रतिप्रचार एक साथ दौड़ रहे थे। 2024 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस लड़ाई को और जटिल बना दिया। अब केवल भाषण नहीं, नकली भाषण भी वोटों को प्रभावित करने लगे। चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक सभी को इस नई चुनौती का सामना करना पड़ा।
हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक से कुछ समय के लिए वीडियो हटना और उसके बाद मेटा की सफाई ने एक बार फिर बहस को तेज कर दिया। यह बहस किसी एक वीडियो या किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। असली सवाल यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता क्या देखेगी, इसका अंतिम निर्णय किसके हाथ में है? क्या यह निर्णय केवल निजी डिजिटल कंपनियों के एल्गोरिद्म करेंगे या लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति भी उनकी जवाबदेही होगी?
यहीं सबसे बड़ी चुनौती है। यदि सोशल मीडिया कंपनियों को पूरी छूट दे दी जाए तो लोकतंत्र पर निजी कॉरपोरेट ताकत का प्रभाव बढ़ेगा। यदि सरकारें हर सामग्री पर नियंत्रण चाहें तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कमजोर होगी, इसलिए समाधान किसी एक पक्ष की जीत में नहीं, बल्कि संतुलित, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था में है। डिजिटल मंचों की शक्ति जितनी बड़ी है, उनकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिस तकनीक को हमने अभिव्यक्ति की आजादी का उत्सव माना था, वही तकनीक धीरे-धीरे हमारी सोच की चौकीदार बनने लगी है। हम सोचते हैं कि हम सोशल मीडिया चला रहे हैं, जबकि कई बार सोशल मीडिया हमें चला रहा होता है। हम मानते हैं कि हमने अपनी राय बनाई है, लेकिन कई बार हमारी टाइमलाइन पहले ही तय कर चुकी होती है कि हमें किस मुद्दे पर खुश होना है, किस पर नाराज होना है और किससे डरना है। लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा और क्या हो सकता है?
लोकतंत्र चुनाव से नहीं, जागरूक नागरिक से मजबूत होता है। यदि नागरिक का विवेक ही एल्गोरिद्म के हवाले हो जाए तो मतदान तो होगा, लेकिन लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा। जरूरत सोशल मीडिया से डरने की नहीं, उसे समझने की है। जरूरत सेंसरशिप की नहीं, जवाबदेही की है। जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि डीपफेक की पहचान हो, फर्जी खबरों पर प्रभावी कार्रवाई हो, एल्गोरिद्म अधिक पारदर्शी हों और समाज में डिजिटल साक्षरता बढ़े, क्योंकि अंततः लोकतंत्र की रक्षा केवल संसद, अदालत और संविधान नहीं करते, जागरूक नागरिक भी करते हैं।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि फेसबुक किसके साथ है, एक्स किसे ट्रेंड करा रहा है या यूट्यूब किसे ज्यादा दिखा रहा है। असली प्रश्न यह है कि लोकतंत्र का रिमोट आखिर किसके हाथ में है – जनता के या एल्गोरिद्म के? यदि इस प्रश्न का उत्तर समय रहते नहीं खोजा गया तो आने वाले वर्षों में लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट संसद के भीतर नहीं, हमारे हाथों में पकड़े उस छोटे-से मोबाइल में छिपा होगा जिसे हम सुविधा का साधन समझते हैं, जबकि वह धीरे-धीरे विचारों का युद्धक्षेत्र बन चुका है। अब यह मान लेने का समय आ गया है कि सोशल मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं रहा, वह लोकतंत्र का चौथा रणक्षेत्र बन चुका है और इस रणक्षेत्र में जीत किसी सरकार या किसी कंपनी की नहीं, बल्कि उसी समाज की होगी जो ट्रेंड से पहले तथ्य, वायरल से पहले विवेक और एल्गोरिद्म से पहले अपने अंतःकरण पर भरोसा करेगा।



