यह दिवाली किसके लिए है?

–सुभाष मिश्र
Diwali Economic Inequality : इस बरस की दिवाली कई तरह की खुशियां, दुख, अफसोस और बहुत सारे प्रसंग लेकर आई है। इस दिवाली पर खुशियां मनाते हुए लोगों ने बम पटाखे फोड़े हैं, लेकिन फिर भी उन्हें याद है कि पूरे वर्षभर पूरी दुनिया में बम फूटते रहे हैं, जिसमें हजारों लोगों की जान गई है, लाखों लोग बेघर हो गए हैं।
अमेरिका, इजरायल, ईरान, रूस और यूक्रेन में पूरे साल भर दिवाली मनाई है, लेकिन ऐसी क्रूरता और हिंसा से भरी दिवाली आज तक किसी ने नहीं देखी थी। बम के गिरने की भारी आवाजों से, इमारतों के मलबों और लोगों के चीखने की आवाज़ एक अजीब सी दुख भरी दिवाली में बदल गई है। दुनिया भर में युद्ध प्रेमी देश ऐसी दीवाली मनाएंगे किसने सोचा था?
इस बरस भारत में भी दिवाली का अलग ही आलम है। भारत में महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी और गरीबी के बेतहाशा आक्रमण के बीच भी दिवाली की चमक देश के चंद अमीरों ने कम नहीं होने दी है। पूरा देश रोशनी से जगमगा रहा है। इमारतें सजी हुई हैं।
दुकानें मिठाइयों और सोने-चांदी से भरी हुई हैं। खरीदारों की भीड़ इतनी बढ़ गई है कि बाजार में पैर रखने की जगह नहीं है। पहली नजर में यह विरोधाभास लगता है कि जब एक और यह बात भी आमजन द्वारा कही जा रही है कि देश में गरीबी बढ़ी है।
महंगाई की मार पड़ी है तो फिर बाजार में खरीदारों की यह भीड़ कैसी है? दुकानें सोने-चांदी के जेवर और हीरे-मोती से किसके लिए भरी पड़ी है। दरअसल यही बाजार का गणित है। उद्योगपतियों से लेकर सामान्य व्यापारियों तक को मालूम था इस दिवाली पर बेतहाशा खरीददारी होगी।
गरीबी और महंगाई की मार आम आदमी पर है, लेकिन अभी भी मुट्ठी भर अमीर लोग ऐसे हैं, जो दिवाली पर अपार खरीदारी करते हैं और अभाव के दुख में इस भ्रम को मिटा देते हैं कि देश में गरीबी और महंगाई है। देश में खरीदारी की सारी ताकत चंद अमीर लोगों के हाथों में है। त्योहारों की खुशी भी उन्हीं के पास है।
व्यापारियों को भरोसा था कि इस बार भी खरीदारी के पुराने रिकॉर्ड टूटेंगे। फर्क इतना है कि खरीदार बदल गए हैं। बेची जाने वाली सामग्री बदल गई है। व्यापारी समझ गए हैं कि कौन सा सामान ज्यादा बिकेगा। उन्होंने हैसियत के हिसाब से बाजार सजाए हैं।

महँगे मोबाइल, गाड़ियाँ, आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और विलासिता की वस्तुओं के लिए बाजार तैयार था। दुकानों की सजावट बता रही थी कि देश में उत्सव है, पैसा है और खर्च करने की इच्छा भी, लेकिन इसी चमक के बीच किसने देखा कि इस समृद्धि में आखिर कितने लोगों की हिस्सेदारी है?
एक ही देश में दिवाली के दो दृश्य दिखाई देते हैं।
एक दृश्य में परिवार अपनी पसंद की गाड़ी खरीदता है, सोने के आभूषणों से लेकर महँगे उपहारों तक पर खर्च करता है और त्योहार पर अपनी आर्थिक हैसियत का प्रदर्शन करता है। दूसरे दृश्य में एक पिता या माँ बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदने से पहले कई बार हिसाब लगाती है।
कहीं पिता मिठाई का डिब्बा छोटा कर देता है, कहीं घर की मरम्मत टाल दी जाती है और कहीं दीपावली का बजट पूरा करने के लिए अगले महीने की जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है। एक ही त्योहार किसी के लिए हैसियत प्रदर्शन है और किसी के लिए इच्छाओं को मारकर मुस्कराने की मजबूरी।
विडंबना यह है कि बाजार में उमड़ती भीड़ को अक्सर समूचे समाज की खुशहाली मान लिया जाता है। बिक्री बढ़ने की खबरें आती हैं, कारोबार के नए कीर्तिमान गिनाए जाते हैं और अर्थव्यवस्था की मजबूती के गुण गाए जाते हैं। मगर बाजार में खर्च होने वाला पैसा किसके पास है? यह सवाल बिक्री के कुल आँकड़ों में कहीं पीछे छूट जाता है।
कुछ परिवारों का लाखों रुपये खर्च करना और लाखों परिवारों का अपनी जरूरतें टालना, दोनों मिलकर बाजार का कारोबार तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन इनसे समाज की समृद्धि का एक जैसा परिणाम नहीं निकाला जा सकता।
भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023–24 के अनुसार, ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति औसत मासिक उपभोग व्यय 4,122 रुपये और शहरी भारत में 6,996 रुपये था। इसी सर्वेक्षण में ग्रामीण भारत के सबसे निचले 5 प्रतिशत आबादी वर्ग का
औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय 1,677 रुपये और शहरी भारत में 2,376 रुपये रह गया है। दूसरी ओर, शीर्ष 5 प्रतिशत वर्ग में यही व्यय ग्रामीण क्षेत्रों में 10,137 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 20,310 रुपये था। ये आँकड़े आय नहीं, उपभोग व्यय के हैं, लेकिन इनके बीच का अंतर आर्थिक हैसियत की असमानता को स्पष्ट बताता है।
इन परिस्थितियों में त्योहारों की चमक को सबकी खुशहाली का आईना मान लेना उचित नहीं होगा। बाजार की ताकत इस बात से तय नहीं होती कि लोग कितना खरीद रहे हैं? यह भी देखना चाहिए कि कितने लोग अपनी जरूरत के मुताबिक खरीद पाने में सक्षम हैं?
जब खरीदने की शक्ति समाज के कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथ में होती है, तब उनकी भारी खरीदारी पूरे बाजार को उत्साहित कर सकती है, जबकि बड़ी आबादी की कठिनाइयाँ उस उत्साह के पीछे छिपी रह जाती हैं।
महँगाई का सबसे असमान प्रभाव भी यहीं दिखाई देता है। संपन्न व्यक्ति के लिए कीमतों में वृद्धि खर्च बढ़ने का मामला हो सकती है, पर उसका खरीददारी का उत्साह कम नहीं कर पाता, लेकिन सीमित आय वाले परिवार के लिए वही वृद्धि दूध, दाल, तेल, दवा या बच्चों की पढ़ाई में से किसी एक जरूरत को कम करने की मजबूरी बन जाती है।
अमीर आदमी बढ़ी हुई कीमत चुकाकर अपनी पसंद की वस्तु खरीद लेता है। गरीब आदमी कई बार कीमत चुकाने से पहले ही अपनी इच्छा छोड़ देता है। बाजार में और सामान्य जन में यह प्रचारित किया जाता है कि जो लोग बाजार नहीं आए उन लोगों को चीजों की जरूरत नहीं थी।
बाजार में उनकी अनुपस्थिति को उसकी जरूरतों के खत्म हो जाने से जोड़ दिया जाता है। यह बात सुनने में ही बहुत अश्लील और अटपटी लगती है ।
दिवाली का अर्थ केवल घरों में दीये जलाना नहीं, बल्कि जीवन में आशा और साझेदारी की रोशनी पैदा करना भी है।
जिस समाज में कुछ घरों की रोशनी दूसरे घरों के अँधेरे को बढ़ाने लगे, वहाँ उत्सव के अर्थ पर पुनर्विचार जरूरी है। अर्थव्यवस्था की असली सफलता कुछ लोगों की असीमित खरीदारी में नहीं, आम आदमी की हैसियत बढ़ाने और सम्मानजनक जीवन में दिखाई देनी चाहिए।
इस दिवाली बाजार खूब चमका होगा, अनेक घरों में खुशियाँ भी आई होंगी, लेकिन उन घरों की खामोशी को भी सुनना होगा जहाँ त्योहार मनाने से पहले जरूरतों और इच्छाओं के बीच चुनाव करना पड़ा। हमारा देश भी अजीब है, खुशहाली का सबसे बड़ा प्रमाण महँगी दुकानों की बिक्री और दुकानों की चमक और बड़ी इमारतों पर बढ़ती रोशनी को मानता है।
होना तो यह चाहिए कि साधारण परिवार की मुस्कान भी कायम रहे जो बिना किसी चिंता के अपने बच्चों के लिए मिठाई खरीद सके। अपने घर के आंगन में दिवाली के चार दीए जला सके।
जिस दिन दिवाली की रोशनी सबकी जिंदगी में बराबर की उम्मीद बन जाएगी, उसी दिन उसका उजाला सचमुच पूरे देश तक पहुँचेगा और यही दिवाली सच्ची दिवाली होगी। इस उम्मीद के साथ दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं !



