ब्रिक्स के बीच भारत की चुनौती और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था - realtimes
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ब्रिक्स के बीच भारत की चुनौती और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था

सुभाष मिश्र
नई दिल्ली में हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। लंबे समय तक वैश्विक व्यापार, भुगतान और वित्तीय व्यवस्था की धुरी रहे डॉलर के सामने भले ही तत्काल कोई ऐसी मुद्रा खड़ी नहीं हुई है, जो उसका स्थान ले सके, लेकिन उसकी आर्थिक हैसियत और एकाधिकार को लेकर सवाल जरूर बढ़ रहे हैं। ब्रिक्स देशों की बढ़ती आर्थिक ताकत, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की कोशिश और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच वैकल्पिक व्यापारिक रास्तों की तलाश इस बदलाव के संकेत हैं। इसलिए दिल्ली में हो रहा सम्मेलन केवल ब्रिक्स देशों की बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में शक्ति संतुलन की नई दिशा तलाशने का प्रयास भी है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सम्मेलन में पश्चिमी देशों की व्यापार नीतियों और प्रतिबंधों पर निशाना साधते हुए कहा है कि रूस पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों के बावजूद उसने नए व्यापारिक रास्ते बनाए और वैकल्पिक बाजार तलाशे।

उन्होंने ब्रिक्स की आर्थिक हिस्सेदारी को जी7 के मुकाबले रखते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र अब केवल अमेरिका और यूरोप तक सीमित नहीं है। इन आंकड़ों की गणना और तुलना के आधार पर बहस हो सकती है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत, चीन, रूस, ब्राजील और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक व्यापार और विकास की दिशा पर पहले से कहीं अधिक प्रभाव डाल रही हैं। ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल बाजार और जनसंख्या है। ऐसे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की चर्चा अब केवल राजनीतिक बयान नहीं रह गई है। यदि सदस्य देश आपसी व्यापार में डॉलर की भूमिका कम करते हैं और अपनी मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था विकसित करते हैं तो इससे डॉलर की तत्काल विदाई भले न हो, लेकिन हर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में उसकी अनिवार्यता जरूर कम हो सकती है। यही वह बदलाव है, जिसे गंभीरता से देखने की जरूरत है। डॉलर को रातोंरात हटाना न संभव है और न ही व्यावहारिक। उसकी ताकत केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों, विदेशी मुद्रा भंडार, ऊर्जा कारोबार और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में उसकी गहरी स्वीकार्यता से आती है। इसलिए ब्रिक्स की सफलता का पैमाना डॉलर को खत्म करना नहीं होना चाहिए। असली सफलता यह होगी कि सदस्य देश ऐसी आर्थिक व्यवस्था खड़ी कर सकें, जिसमें व्यापार और भुगतान के लिए किसी एक देश की मुद्रा पर निर्भरता अनिवार्य न रहे। भारत के लिए यही सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ी चुनौती है। भारत के अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापारिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध हैं, वहीं रूस के साथ उसके पुराने सामरिक और ऊर्जा संबंध कायम हैं। चीन के साथ आर्थिक संबंधों के साथ प्रतिस्पर्धा और सीमा विवाद भी हैं। दूसरी ओर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ भारत अपने आर्थिक संबंधों का विस्तार कर रहा है।

ऐसे में भारत के लिए किसी एक धड़े का हिस्सा बनना उसके हित में नहीं होगा। उसकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक ध्रुवों के बीच संवाद का पुल बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में भी यही संतुलन दिखाई देता है। भारत रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है। यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए भारत लगातार संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने की बात करता रहा है। यह नीति भारत को किसी एक खेमे की राजनीति से अलग रखती है और उसे वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने का अवसर देती है। लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि ब्रिक्स कहीं किसी एक देश के आर्थिक प्रभाव का मंच न बन जाए। विशेष रूप से चीन की विशाल आर्थिक क्षमता और बढ़ते वैश्विक प्रभाव के बीच भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी होगी। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की राह भी आसान नहीं है। इसके लिए मजबूत वित्तीय बाजार, मुद्रा की स्थिरता, भरोसेमंद भुगतान व्यवस्था और व्यापार संतुलन जरूरी है। केवल यह घोषणा कर देना कि व्यापार रुपये या रूबल में होगा, पर्याप्त नहीं है। यदि व्यापार में लगातार असंतुलन बना रहा तो स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की व्यवहारिक सीमाएं सामने आएंगी। इसी तरह ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनाने का प्रयास भी भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। भारत के आर्थिक विकास में अमेरिका और यूरोप के निवेश, तकनीक और बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए भारत की रणनीति डॉलर को हराने की नहीं, बल्कि आर्थिक विकल्प बढ़ाने की होनी चाहिए।

ब्रिक्स की असली परीक्षा सम्मेलन में दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले व्यापार में होगी। क्या सदस्य देश आपस में व्यापार बढ़ा पाएंगे? क्या भुगतान की लागत घटेगी? क्या स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन वास्तव में बढ़ेगा? क्या वैकल्पिक परिवहन और व्यापार मार्ग मजबूत होंगे? और क्या विकासशील देशों को पूंजी और तकनीक तक बेहतर पहुंच मिलेगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि दिल्ली का सम्मेलन केवल कूटनीतिक आयोजन था या वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत। दुनिया की अर्थव्यवस्था किसी सम्मेलन के बाद अचानक दोगुनी नहीं होगी और डॉलर भी किसी एक घोषणा से अपनी ताकत नहीं खो देगा। लेकिन आर्थिक शक्ति का संतुलन जरूर बदल सकता है। जिस दुनिया में कभी डॉलर के सामने किसी वास्तविक विकल्प की कल्पना कठिन थी, वहां आज स्थानीय मुद्राओं, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और बहुध्रुवीय व्यापार व्यवस्था पर गंभीर चर्चा हो रही है। यह बदलाव अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसलिए दिल्ली से निकलने वाला संदेश डॉलर की हार का नहीं, बल्कि आर्थिक एकाधिकार को चुनौती देने वाली व्यवस्था का होना चाहिए। भारत की चुनौती यह है कि वह इस बदलाव का हिस्सा बने भी और इसकी दिशा को संतुलित भी रखे। यदि भारत ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी राजनीति से निकालकर व्यापार, तकनीक, विकास और संवाद का व्यावहारिक मंच बनाने में सफल होता है, तो उसकी भूमिका केवल सम्मेलन के मेजबान की नहीं होगी। वह उस नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, जिसमें किसी एक शक्ति के आर्थिक फैसले पूरी दुनिया के लिए अंतिम सत्य न हों। यही बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की असली परीक्षा है और यही दिल्ली के ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश भी हो सकता है।

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