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जी 20 सम्मेलन से बदलाव की उम्मीद

कोरोना महामारी के बाद दुनिया को उम्मीद थी कि वह इससे उबरने की कोशिश करेगा। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विश्व मानव जीवन के लिए जरूरी बुनियादी चीजों मसलन खाद्यान्न और ईंधन की भारी कमी और इसकी वजह से बढ़ी महंगाई से जूझ रहा है। इस बीच जानकारों ने वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका जता दी है। ऐसे में जी 20 जैसे संगठन की महत्ता बढ़ जाती है।  मौजूदा परिदृश्य में  जी-20 समूह के सदस्य देशों का दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 80 फीसद की हिस्सेदारी है, जबकि वैश्विक कारोबार में इन देशों की हिस्सेदारी तीन चौथाई है। वैसे इन देशों के पास दुनिया की करीब दो तिहाई आबादी है। ऐसे में इस समूह पर जिम्मेदारी बढ़ना लाजिमी है। जी 20 देशों ने बाली सम्मेलन में इस ओर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है।

कोरोना की महामारी के चलते अभी तक आमने-सामने की बैठकें टलती रही थीं। कई बार प्रत्यक्ष मिलन और बातचीत से गंभीर संकट तक हल हो जाते हैं। शायद यही वजह है कि बाली सम्मेलन में कई द्विपक्षीय देशों के रिश्ते की बर्फ पिघलती हुई दिखी। इस सम्मेलन के कुछ ही वक्त पहले कम्बोडिया में पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन हुआ तो इसी बीच मिस्र में जलवायु सम्मेलन जारी है। इसके कुछ ही दिनों बाद थाईलैंड में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन होना है। जाहिर है कि जिस तरह बाली सम्मेलन में सकारात्मकता दिखी है, उसका असर इन सम्मेलनों पर भी बेहतर तरीके से पड़ना संभव है।

इस शिखर सम्मेलन के दौरान चीन और अमेरिका के राजाध्यक्षों ने आमने सामने वार्ता की ,जिस ने  सकारात्मक संकेत दिया गया है ।दोनों देश जहां दुनिया की एक और दो नंबर की अर्थव्यवस्था हैं, वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोनों की हिस्सेदारी 42 खरब डॉलर की है। जबकि दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था करीब 110 खरब डॉलर की ही है। इसी तरह दुनिया के कुल रक्षा बजट में 43 प्रतिशत की हिस्सेदारी इन्हीं दोनों देशों की है। वैश्विक विनिर्माण बजट में इन्हीं दोनों देशों की 45 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ये कुछ वजहें हैं कि जी 20 पर दोनों का ज्यादा प्रभाव रहता है। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इसे समझेंगे और दुनिया को खूबसूरत बनाने की दिशा में काम करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। (साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

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