सेवा संकल्प: उत्सव से आगे, सेवा व्यवस्था तक

-सुभाष मिश्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक देशभर में ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाया जा रहा है। इस अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों से जोड़ा गया है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ शुरू हुई उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी के 25 वर्ष पूरे होने का अवसर भी इसी अवधि में आएगा। भाजपा ने इस पूरे महीने को सेवा, जनभागीदारी और प्रधानमंत्री के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन तथा शासन से जुड़े कार्यों को लोगों तक पहुंचाने के अवसर के रूप में निर्धारित किया है।
रक्तदान शिविर होंगे, स्वास्थ्य परीक्षण होंगे, स्वच्छता अभियान चलेंगे, सरकारी योजनाओं से वंचित लोगों को योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए शिविर लगाए जाएंगे। सेमिनार, प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, युवाओं के कार्यक्रम और जागरूकता अभियान होंगे। ‘वडनगर से वाराणसी’ जैसी यात्राएं भी इस अभियान का हिस्सा हैं। कुछ राज्यों ने इसके अंतर्गत सरकारी योजनाओं की जानकारी और नागरिकों को सेवाओं से जोड़ने के लिए विशेष शिविरों की योजना बनाई है।
प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रमों में भारत की आर्थिक और तकनीकी प्रगति का उल्लेख किया। सेमीकॉन इंडिया 2026 के मंच से उन्होंने भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा, निर्माण क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दिया।
इन उपलब्धियों को याद करना अभियान का एक पक्ष है। लेकिन ‘सेवा संकल्प’ शब्द अपने भीतर इससे कहीं बड़ा अर्थ रखता है।
भारत में सेवा केवल प्रशासनिक शब्द नहीं है। यह हमारी सामाजिक और आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा रही है।
महात्मा गांधी के प्रिय भजन की पंक्ति—‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे’—सेवा के उस भाव को सामने रखती है जिसमें दूसरे के दुख को अपना दुख समझना और बिना अहंकार के सहायता करना शामिल है। गुरुद्वारों की सेवा परंपरा में सेवादार का कोई बड़ा-छोटा दर्जा नहीं होता। आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य स्वयं को ईश्वर का सेवक मानता रहा है।
कबीर की ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ भी मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन और अपनी जिम्मेदारी के भाव को सामने रखती है।
इसलिए सेवा का अर्थ केवल किसी को कुछ दे देना नहीं है। सेवा का अर्थ है—दूसरे की आवश्यकता को समझना, उसकी गरिमा बनाए रखना और उसके काम को आसान बनाना।
यहीं से ‘सेवा संकल्प’ का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण सवाल शुरू होता है।
अगर राजनीतिक कार्यकर्ता रक्तदान कर रहे हैं, स्वच्छता अभियान चला रहे हैं, स्वास्थ्य शिविर लगा रहे हैं और लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए शिविर आयोजित कर रहे हैं, तो यह जनसेवा का एक पक्ष है। लेकिन जिस नागरिक को सरकारी सेवा लेने के लिए तहसील जाना पड़ता है, पटवारी के कार्यालय जाना पड़ता है, अस्पताल जाना पड़ता है, बैंक जाना पड़ता है या किसी प्रमाणपत्र और अनुमति के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं—उसके अनुभव को भी सेवा संकल्प का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
क्योंकि नागरिक के लिए सरकार की सबसे पहली पहचान किसी बड़े भाषण से नहीं, बल्कि डिलीवरी सिस्टम से होती है।
उसे पेंशन समय पर मिली या नहीं?
किसान का भुगतान समय पर हुआ या नहीं?
आवास की स्वीकृति के बाद घर वास्तव में कब मिला?
जाति, आय या निवास प्रमाणपत्र के लिए उसे कितने चक्कर लगाने पड़े?
अस्पताल में उसे सम्मान और संवेदनशीलता मिली या नहीं?
बैंक में उसका काम बिना अनावश्यक परेशानी के हुआ या नहीं?
तहसील में उसकी फाइल कितने दिन पड़ी रही?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या उसे अपना वैध काम कराने के लिए किसी सिफारिश, दलाल या रिश्वत की जरूरत पड़ी?
यही वह जगह है जहां ‘सेवा संकल्प’ को एक राजनीतिक आयोजन से आगे बढ़कर प्रशासनिक आत्ममंथन में बदलने की संभावना पैदा होती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे राजनीतिक संकल्पों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया। इसलिए आज जब उनके 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को सेवा के रूप में याद किया जा रहा है, तो इस संकल्प की परीक्षा सरकारी दफ्तरों के भीतर भी होनी चाहिए।
जिस सरकारी कर्मचारी को जनता की सेवा के लिए वेतन मिलता है, उसके लिए सेवा कोई अतिरिक्त सामाजिक कार्य नहीं है। वह उसके पद की जिम्मेदारी है।
जनता जब अस्पताल में जाती है तो वह एहसान लेने नहीं जाती। वह अपनी सुविधा और अधिकार लेने जाती है।
जब वह तहसील जाती है तो वह किसी अधिकारी पर उपकार नहीं कर रही होती। वह अपने दस्तावेज और अधिकार से जुड़ा काम कराने जाती है।
जब किसान सरकारी योजना के लिए आवेदन करता है तो वह किसी राजनीतिक दल का लाभार्थी मात्र नहीं है। वह उस व्यवस्था का नागरिक है जिसके लिए सरकार ने योजना बनाई है।
इसलिए सेवा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब सरकारी सेवा में संवेदनशीलता, समयबद्धता, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े।
आज एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर क्यों आर्थिक रूप से सक्षम नागरिक सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल या दूसरी सार्वजनिक सेवाओं की जगह निजी संस्थानों की ओर जाते हैं? इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता और अनुभव उनमें से एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अगर सरकारी व्यवस्था नागरिक को यह भरोसा दे सके कि उसका काम समय पर, बिना सिफारिश और बिना अतिरिक्त खर्च के होगा, तो यही सेवा संकल्प की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
इसलिए इस एक महीने को केवल उपलब्धियों की प्रदर्शनी का महीना न बनाकर सेवा व्यवस्था की समीक्षा का महीना भी बनाया जा सकता है।
हर जिले में यह पूछा जा सकता है कि पिछले वर्ष कितने लोगों को योजनाओं का लाभ मिला? कितने आवेदन लंबित हैं? किस विभाग में सबसे ज्यादा शिकायतें हैं? नागरिकों को किन सेवाओं के लिए सबसे ज्यादा चक्कर लगाने पड़ते हैं? शिकायतों का निपटारा कितने समय में होता है? और क्या अधिकारी तथा कर्मचारी नागरिकों के साथ अपेक्षित संवेदनशीलता से व्यवहार कर रहे हैं?
ऐसे सवाल किसी सरकार या राजनीतिक दल के विरोध के सवाल नहीं हैं। ये लोकतंत्र में बेहतर शासन के सवाल हैं।
किसी सरकार के कामकाज की प्रशंसा हो सकती है। उसकी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाया जा सकता है। योजनाओं के लाभार्थियों की कहानियां सामने लाई जा सकती हैं। लेकिन उसी के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि योजना कागज से जमीन तक कितनी आसानी से पहुंची।
‘सेवा’ का सबसे सुंदर रूप वह है जिसमें लेने वाले को लेने का अहसास न हो और देने वाले को देने का अहंकार न हो।
यही गांधी के ‘वैष्णव जन’ का भाव है। यही गुरुद्वारों की सेवा परंपरा का भाव है। यही भारतीय समाज की उस लंबी परंपरा का भाव है जिसमें मनुष्य अपने जीवन को केवल अपने लिए नहीं मानता।
आज ‘सेवा संकल्प अभियान’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को जनता तक पहुंचाने का माध्यम भी है और जनसेवा की भावना को व्यापक बनाने का अवसर भी। राजनीतिक दल स्वाभाविक रूप से ऐसे अभियानों के माध्यम से अपने काम और अपनी विचारधारा को जनता तक ले जाते हैं। इसलिए इस अभियान का राजनीतिक संचार वाला पक्ष भी स्पष्ट है। लेकिन नागरिक समाज के लिए इसका एक दूसरा अर्थ भी निकाला जा सकता है—सरकार और जनता के बीच सेवा की गुणवत्ता पर संवाद।
आखिर किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि उसके कार्यक्रम कितने बड़े हुए, कितने पोस्टर लगे या कितने दीप जले।
सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि जब एक सामान्य नागरिक किसी सरकारी कार्यालय का दरवाजा खटखटाता है तो उसके साथ कैसा व्यवहार होता है।
अगर उसका काम बिना रिश्वत, बिना सिफारिश और बिना अनावश्यक देरी के हो जाता है, तो वहीं से ‘सेवा संकल्प’ का असली दीप जलता है।
और अगर देश के करोड़ों नागरिकों को सरकारी संस्थानों में सम्मानजनक, समयबद्ध और पारदर्शी सेवा मिलने लगे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को सेवा के रूप में याद करने का इससे बड़ा अर्थ शायद कोई दूसरा नहीं हो सकता।
सेवा का उत्सव मनाइए, लेकिन सेवा की व्यवस्था भी बदलिए।
क्योंकि अंततः जनता को यह याद नहीं रहता कि उसके लिए कितने शिविर लगाए गए थे; उसे यह याद रहता है कि जरूरत के समय उसका काम कितनी आसानी से हुआ था।



