नौकरी की परीक्षा में सरकारों की भी परीक्षा

–सुभाष मिश्र
देश में युवाओं के बीच इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उसे केवल छात्र आंदोलन कहकर आगे बढ़ जाना शायद सरकारों की सबसे बड़ी भूल होगी। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब झारखंड के मोरहाबादी तक पहुंच गई है और यह आवाज किसी मंदिर-मस्जिद की नहीं है, किसी जाति की नहीं है, किसी राजनीतिक दल के झंडे की नहीं है। यह आवाज उस नौजवान की है जिसने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल किताबों के बीच बैठकर गुजार दिए, जिसने मां-बाप की जमा पूंजी से कोचिंग की फीस भरी, किराए का कमरा लिया, दिन-रात पढ़ाई की और फिर परीक्षा के दरवाजे पर पहुंचकर उससे कहा गया कि परीक्षा में ही गड़बड़ी हो गई। सवाल यह है कि आखिर इस नौजवान की गलती क्या है?
झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहा आंदोलन इसी सवाल का विस्तार है। छात्र लगातार सरकार पर दबाव बना रहे हैं। बातचीत के दौर चल रहे हैं। 7 अगस्त को सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई, सरकार ने मांगों पर विचार का भरोसा दिया, लेकिन कोई अंतिम सहमति नहीं बनी और छात्रों ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया। उनका कहना है कि अगर 9 अगस्त तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो 10 अगस्त से विधानसभा मार्च किया जाएगा। यह सिर्फ तारीखों का खेल नहीं है। इसके पीछे वह बेचैनी है जो परीक्षा व्यवस्था में बार-बार सामने आ रही गड़बडिय़ों ने पैदा की है।
21 जुलाई को जेपीएससी कार्यालय और उससे जुड़े ठिकानों पर सीआईडी की कार्रवाई हुई। परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े लोगों से पूछताछ और हिरासत की खबर सामने आई। परीक्षा कराने वाली आउटसोर्स एजेंसी के ठिकाने की भी जांच हुई और बाद में जेपीएससी अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने इस्तीफा दिया। खुद खियांग्ते ने बाद में कहा कि उन्होंने निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए स्वेच्छा से इस्तीफा दिया। अब छात्र सीआईडी की जांच से संतुष्ट नहीं हैं और स्वतंत्र जांच, परीक्षा रद्द करने, जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों पर कार्रवाई तथा पूरी परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रहे हैं। यहां सरकार को छात्रों की हर मांग माननी ही होगी, ऐसा नहीं है, लेकिन सरकार को यह जरूर समझना होगा कि जब छात्र जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाने लगे तो मामला सिर्फ परीक्षा का नहीं रह जाता, मामला भरोसे का हो जाता है और भरोसा किसी सरकारी विज्ञप्ति से वापस नहीं आता। भरोसा तब आता है जब व्यवस्था अपने काम से यह साबित करती है कि जिसने मेहनत की है उसका हक कोई नहीं छीन सकता। प्रतियोगी परीक्षा में बैठने वाला युवा सिर्फ दो-तीन घंटे का पेपर नहीं देता। वह कई साल देता है। उसकी उम्र का एक हिस्सा जाता है। उसके माता-पिता की कमाई जाती है। परिवार की उम्मीद जाती है। कई बार गांव का घर छोडक़र शहर में किराए का कमरा लेकर रहने का खर्च जाता है। इसलिए सरकार के लिए परीक्षा रद्द करना भले ही एक प्रशासनिक फैसला हो, लेकिन छात्र के लिए वह जिंदगी का एक साल होता है। कभी-कभी दो साल और कभी उम्र की सीमा निकल जाने पर पूरा अवसर।
यही वजह है कि अब छात्र पूछ रहा है कि मेहनत की गारंटी कौन देगा? परीक्षा की शुचिता की गारंटी कौन देगा? समय पर परिणाम की गारंटी कौन देगा? और अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी हो गई तो उसकी कीमत कौन चुकाएगा? सरकार के पास हर सवाल का जवाब होना चाहिए, क्योंकि सरकारी नौकरी कोई एहसान नहीं है। यह उस युवा का अधिकार है जो निर्धारित प्रक्रिया में शामिल होता है, शुल्क देता है, योग्यता हासिल करता है और निष्पक्ष चयन की उम्मीद करता है। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे केवल झारखंड की राजनीति के चश्मे से देखना खतरनाक होगा। मध्य प्रदेश में व्यापम का विवाद हो, छत्तीसगढ़ में पीएससी को लेकर उठे सवाल हों या देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद हर जगह एक चीज समान दिखाई देती है और वह है युवाओं का घटता भरोसा। सरकार बदलने से यह समस्या खत्म नहीं होगी, क्योंकि समस्या किसी एक पार्टी में नहीं, उस सिस्टम में है जिसमें परीक्षा को एक प्रशासनिक प्रक्रिया समझ लिया गया है जबकि वास्तव में वह लाखों परिवारों के भविष्य का फैसला होती है।
राजनीतिक दलों के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। विपक्ष में रहते हुए परीक्षा गड़बड़ी पर आंदोलन करना आसान है, सत्ता में आने के बाद उसी परीक्षा व्यवस्था को बदलना मुश्किल। अब युवा दोनों बातें देख रहा है। उसे यह फर्क नहीं पड़ता कि सरकार भाजपा की है, कांग्रेस की है या किसी क्षेत्रीय दल की। उसे सिर्फ यह देखना है कि उसकी परीक्षा निष्पक्ष है या नहीं? आज झारखंड में सवाल हेमंत सोरेन सरकार से है, कल किसी दूसरे राज्य में किसी दूसरी सरकार से होगा, इसलिए इसे सत्ता और विपक्ष की लड़ाई बनाने के बजाय व्यवस्था सुधारने का अवसर बनाना चाहिए।
दरअसल यह आंदोलन भारतीय राजनीति में बदलती हुई युवा प्राथमिकताओं का संकेत भी है। लंबे समय तक युवाओं को धर्म, जाति, क्षेत्र और पहचान की राजनीति में बांटकर देखने की कोशिश होती रही। लेकिन अब वही युवा पूछ रहा है मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा कब होगी? रिजल्ट कब आएगा? भर्ती कब होगी? और अगर परीक्षा में गड़बड़ी हुई तो जिम्मेदार कौन होगा? यह सवाल सुनने में बहुत साधारण लगता है। लोकतंत्र में इससे बड़ा सवाल कोई नहीं हो सकता, क्योंकि जिस देश का युवा अपने भविष्य के लिए व्यवस्था पर भरोसा नहीं करेगा, वह व्यवस्था कितने दिन तक मजबूत रह सकती है?
सरकारों को अब एक स्थायी और स्वतंत्र परीक्षा निगरानी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्र, डिजिटल निगरानी, ओएमआर, उत्तर पुस्तिकाओं, परिणाम और शिकायतों तक हर चरण का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए। परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। जिस एजेंसी या अधिकारी पर गंभीर आरोप हों, उसे जांच पूरी होने तक संवेदनशील परीक्षा प्रक्रिया से अलग रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। सबसे जरूरी बात यह कि जांच सिर्फ तब शुरू न हो जब छात्र सडक़ पर उतर आएं। ऐसी व्यवस्था हो जो गड़बड़ी को आंदोलन से पहले पकड़ सके, क्योंकि आखिर सरकार की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं है कि उसने आंदोलन को रोक दिया। सरकार की सबसे बड़ी सफलता यह है कि आंदोलन करने की नौबत ही न आए।
आज झारखंड में छात्र सडक़ पर हैं। कल यह आवाज छत्तीसगढ़ पहुंच सकती है, मध्य प्रदेश पहुंच सकती है, बिहार पहुंच सकती है और देश के किसी भी हिस्से में उठ सकती है। इसे डरने की जरूरत नहीं है। इसे समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में सवाल पूछता हुआ युवा खतरा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। खतरा तब है जब युवा सवाल पूछना छोड़ दे और यह मान ले कि उसकी मेहनत का फैसला व्यवस्था नहीं, पहुंच और पहचान करेगी, इसलिए झारखंड के छात्रों की आवाज को सिर्फ झारखंड की आवाज मत समझिए। यह उस पीढ़ी की आवाज है जो कह रही है कि हमें भाषण नहीं चाहिए, हमें भरोसा चाहिए। हमें आश्वासन नहीं चाहिए, हमें निष्पक्ष परीक्षा चाहिए। हमें राजनीतिक सहानुभूति नहीं चाहिए, हमें अपना अधिकार चाहिए।
सरकारों को भी तय करना होगा कि वे हर बार आंदोलन खत्म कराने की कोशिश करेंगी या ऐसी व्यवस्था बनाएंगी जिसमें किसी छात्र को सडक़ पर खड़े होकर यह न कहना पड़े कि हमने पढ़ाई की है, हमने मेहनत की है, अब कम से कम हमारी परीक्षा तो ईमानदारी से ले लीजिए। अब सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या इस देश में मेहनत करने वाले नौजवान को अपनी मेहनत के परिणाम पर भरोसा रह गया है? अगर इस सवाल का जवाब ‘हां’ रखना है तो सरकारों को परीक्षा प्रणाली बदलनी होगी। और अगर जवाब ‘नहीं’ होने दिया गया तो फिर जंतर-मंतर से मोरहाबादी तक उठती यह आवाज केवल एक आंदोलन नहीं रहेगी, यह आने वाले भारत के युवा असंतोष की पहचान बन सकती है।



