
चीफ जस्टिस ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां गरीबी भी है और केंद्र सरकार भूखे लोगों को भोजन मुहैया कराने की व्यवस्था करती है। इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुफ्त की रेवड़ियों से इसे हासिल नहीं किया जा सकता। इस पर सीजेआई ने कहा कि ‘सामाजिक कल्याण की योजनाएं और रेवड़ियों में फर्क है।‘
मामले में कोर्ट के आमंत्रण पर अपनी राय रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “यह एक जटिल मुद्दा है और इसके लिए हमारे पास आंकड़े होने चाहिए।” उन्होंने कहा, “अगर मेरी कोई कर्मचारी बस या मेट्रों में यात्रा के लिए मुझसे पैसे की मांग करती है और मैं उसे दे देता हूं, लेकिन बाद में मुझे वह बताती है कि उसे तो मुफ्त में यात्रा करने का मौका मिला, क्योंकि महिलाओं के लिए यात्रा मुफ्त थी। तो। क्या इसे रेवड़ी माना जाएगा?” उन्होंने कहा कि मुद्दे के बारे में फैसला तभी हो सकता है जब हमारे पास आंकड़े हों कि इससे क्या फर्क पड़ रहा है।



