किताब से इतना डर क्यों?

सुभाष मिश्र
कभी-कभी लगता है कि हमारे समय में किताबें पहले से ज्यादा खतरनाक हो गई हैं, इसलिए नहीं कि किताबों में कोई नया हथियार छिपा है, बल्कि इसलिए कि किताब आदमी को सोचने के लिए मजबूर करती है। किताबें अच्छे बुरे की पहचान कराती है। किताबें व्यक्ति को विचारवान बनाती हैं, जिससे वह अपने समाज और देश-दुनिया को बेहतर ढंग से समझ सकता है। सही गलत में भेद कर सकता है। शायद यही कारण है कि दुनिया के हर दौर में सत्ता, कट्टरपंथी संस्थाएँ और विचारों पर पहरा लगाने वाली ताकतों को सबसे पहले किताब से ही डर लगा है।
अहमदाबाद से सामने आई घटना इसी डर की एक तस्वीर है। 27 अगस्त को अहमदाबाद के वस्रापुर स्थित एक सार्वजनिक उद्यान में कुछ विद्यार्थी और युवा शांतिपूर्वक बैठकर किताबें पढ़ रहे थे। वहां मलाला यूसुफजई की ‘आई एम मलाला’, ऐनी फ्रैंक की च्द डायरी ऑफ़ यंग गर्ल’, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू और दूसरे लेखकों की किताबें पढ़ी जा रही थीं। कोई हथियार नहीं था, कोई हिंसक प्रदर्शन नहीं था, कोई सडक़ जाम नहीं थी। हाथ में अगर कुछ था तो किताब थी, लेकिन देखते-देखते किताबों के इस शांत संसार में कुछ लोग दाखिल हुए और पढऩे वालों के साथ मारपीट शुरू हो गई। पुलिस के अनुसार घटना में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
सवाल यह नहीं है कि वहां कौन-सी किताब पढ़ी जा रही थी। असली सवाल यह है कि किसी व्यक्ति या संस्था को यह अधिकार किसने दिया कि वह दूसरे व्यक्ति से पूछे कि तुम यह किताब क्यों पढ़ रहे हो? या तुम यह किताब मत पढ़ो। अगर कुछ मु_ी भर लोगों को यह लगता है कि कोई किताब नहीं पढ़ी जानी चाहिए तो उसे सरकार द्वारा प्रतिबंधित कराया जाना चाहिए। कानून खुद हाथ में लेकर किसी को किताब पढऩे से रोकना नहीं था। यदि कोई पढ़ रहा है तो उसके साथ मारपीट भी नहीं की जानी चाहिए थी और अगर कुछ लोगों को किताब पसंद नहीं है तो वे उसे न पढ़ें। उसकी आलोचना करे। उसके लेखक के विचारों से असहमति जताए। उसके खिलाफ लेख लिखे। बहस करे। सार्वजनिक मंच पर तर्क रखे, लेकिन क्या वह दूसरे के हाथ से किताब छीन सकता है? क्या वह उसे पढऩे से रोक सकता है? क्या वह मारपीट कर सकता है? लोकतंत्र में असहमति का उत्तर तर्क है, लाठी नहीं।
यदि कोई किताब प्रतिबंधित नहीं है तो किसी निजी नागरिक या भीड़ को उसे पढऩे से रोकने का अधिकार नहीं मिल जाता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस स्वतंत्रता के दायरे में सूचना और विचारों को प्राप्त करने के अधिकार को महत्वपूर्ण माना है। यानी बात सिर्फ किताब पढऩे की नहीं है। बात उस मानसिक स्वतंत्रता की है, जिसके कारण कोई व्यक्ति किताब पढक़र अपने जीवन और समाज के लिए निर्णय लेने की समझ पैदा करता है। आज अगर किसी को मलाला की किताब से परेशानी है तो वह मलाला के विचारों की आलोचना करे। कल किसी को भगत सिंह से परेशानी हो सकती है। कोई गांधी को पढऩा चाहेगा, कोई सावरकर को। कोई आंबेडकर को पढ़ेगा, मार्क्स, विवेकानंद या अरविंदो को पढऩा चाहेगा। लोग अपनी इच्छा के अनुसार रामायण, महाभारत, कुरान, बाइबिल पढ़ेंगे। कोई प्रेमचंद तक को पढ़ते हैं। कोई अपने से बिल्कुल विपरीत विचार वाले लेखक को पढ़ता है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि पाठक को इन सबको पढऩे और फिर अपना विचार बनाने का अवसर और अधिकार मिला है। इस तरह के हुड़दंग से हम आखिर किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं? क्या ऐसा समाज जहां बच्चे एक ही किताब पढ़ें, युवा एक ही विचार सुनें, नागरिक एक ही भाषा बोलें, एक ही तरह के कपड़े पहनें, एक ही तरह से समाज और देश की व्याख्या करें और एक ही तरह से इतिहास को जाने-समझे? अगर ऐसा है तो फिर हमें लोकतंत्र नहीं, एकरूपता चाहिए और एकरूपता में तानाशाही आ जाती है। लोकतंत्र एकरूपता का नाम नहीं है। लोकतंत्र तो सामूहिकता को स्वीकार करने की कला है। भारत इसलिए भारत है क्योंकि यहां हजारों साल से विचारों की अनेक धाराएं साथ-साथ बहती रही हैं। यहां चार्वाक भी हुआ और शंकराचार्य भी। बुद्ध भी हुए और महावीर भी। कबीर ने सवाल पूछे तो तुलसी ने अपनी राह बनाई। गांधी और भगत सिंह के रास्ते अलग थे, लेकिन दोनों को पढऩे से हर व्यक्ति को जीवन और समाज के लिए सीख मिली है ।
किसी विचार को सुनने से इनकार करना भी आपका अधिकार हो सकता है, लेकिन दूसरे को वह विचार पढऩे से रोकना लोकतंत्र नहीं है और जब असहमति हिंसा में बदल जाती है तो मामला सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं रहता, मामला कानून के शासन का भी हो जाता है। ऐसे लोग या संस्थाएं अपने आप को कानून से ऊपर समझ लेते हैं। अहमदाबाद की घटना इसलिए भी चिंतित करती है, क्योंकि गुजरात को लंबे समय से विकास और सुशासन के एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऐसे राज्य में सार्वजनिक स्थान पर शांतिपूर्वक किताब पढ़ रहे लोगों तक विवाद पहुंचता है और फिर विवाद हिंसा में बदल जाता है तो सवाल केवल उन लोगों से नहीं पूछा जाना चाहिए जो वहां हिंसा करने पहुंचे थे। सवाल प्रशासन से भी पूछा जाना चाहिए कि कानून हाथ में लेने वालों को यह भरोसा और साहस कहां से मिलता है कि वे किसी दूसरे की स्वतंत्रता का फैसला सडक़ पर कर सकते हैं?
यहां भारतीय जनता पार्टी और बजरंग दल की राजनीतिक निकटता पर बहस करने से ज्यादा महत्वपूर्ण एक दूसरी बात है। किसी संगठन की विचारधारा कुछ भी हो, वह कानून से ऊपर नहीं हो सकता। यदि कोई अपराध करता है तो उसका जवाब कानून को देना चाहिए, संगठन की पहचान को नहीं। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी यही है कि वह यह सुनिश्चित करे कि बहुमत की ताकत अल्पमत की आवाज को कुचलने का हथियार न बन जाए। किताबों का इतिहास बताता है कि प्रतिबंध लगाने की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं। दुनिया में ऐसे दौर आए हैं जब कुछ किताबें रखना, पढऩा या प्रकाशित करना अपराध माना गया। नाजी जर्मनी में किताबें जलाने की घटनाएं इतिहास का हिस्सा हैं। तानाशाही व्यवस्थाओं ने हमेशा शब्दों से डरने की कोशिश की है, क्योंकि शब्द सवाल पैदा करते हैं और सवाल सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर करते हैं।
हिटलर भी किताबों और लेखकों से भयभीत था, जो उसकी विचारधारा, नस्लवाद, यहूदी-विरोध और तानाशाही का विरोध करते थे, इसलिए उसने किताबों पर सेंसरशिप, प्रतिबंध और सार्वजनिक रूप से किताबें जलाने की मुहिम चलाई। 10 मई 1933 को जर्मनी के अनेक विश्वविद्यालयी नगरों में हजारों किताबें सार्वजनिक रूप से जलाई गईं। इनमें यहूदी लेखकों, समाजवाद और शांतिवादी लेखकों और नाज़ी-विरोधी साहित्य की किताबें जलायी गई थीं।
एक दिलचस्प विरोधाभास है। हिटलर स्वयं ‘मीन काम्फ’ का लेखक था और उसके शासन ने उसकी किताब को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया। यानी समस्या किताब से नहीं, किताब में मौजूद विचार से थी। नाज़ी शासन चाहता था कि लोग क्या पढ़ें, क्या लिखें और क्या सोचें, इन सब पर उसका नियंत्रण हो। उसने समाचारपत्रों, पुस्तकों, पाठ्यपुस्तकों, रेडियो, फिल्मों और कला तक को नियंत्रित किया। दरअसल, तानाशाह किताबों को इसलिए नहीं जलाता कि वे कागज़ की होती हैं, बल्कि इसलिए कि उनमें ऐसे ताकतवर विचार होते हैं जिन्हें सत्ता की आग भी जला नहीं सकती, लेकिन भारत ने अपना संविधान बनाते समय एक अलग रास्ता चुना था। हमने नागरिक को बोलने का अधिकार दिया। विचार रखने का अधिकार दिया और यही अधिकार लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाते हैं। संविधान का अनुच्छेद 19 इन्हीं स्वतंत्रताओं की बुनियाद है।
भीड़ का फैसला कानून नहीं हो सकता। किसी किताब की वैचारिक आलोचना की जा सकती है, लेकिन किताब पढऩे वाले की पिटाई नहीं की जा सकती। किसी फिल्म की आलोचना की जा सकती है, लेकिन दर्शक को थिएटर से घसीटकर निकालना अपराध है। किसी लेखक से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके पाठक को अपराधी मान लेना लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। आज हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को क्या सिखाना चाहते हैं, सवाल पूछना या सवाल से डरना?
अगर बच्चा भगत सिंह पढ़ता है तो उसे भगत सिंह से आगे गांधी पढऩे दीजिए। गांधी पढ़ता है तो आंबेडकर पढऩे दीजिए। आंबेडकर पढ़ता है तो सावरकर भी पढऩे दीजिए। मलाला पढ़ता है तो उसके आलोचकों को भी पढऩे दीजिए, क्योंकि पढऩे वाला व्यक्ति किसी एक किताब का बंदी नहीं होता। वह किताबों के बीच अपना विवेक बनाता है और जिस समाज को अपने नागरिकों के विवेक पर भरोसा नहीं होता, वह धीरे-धीरे किताबों से डरने लगता है। फिर किताब से विचार निकलता है, विचार से सवाल निकलता है, सवाल से असहमति निकलती है और असहमति से लोकतंत्र मजबूत होता है, इसलिए किताब को मत रोकिए। किताब का जवाब किताब से दीजिए। विचार का जवाब विचार से दीजिए। तर्क का जवाब तर्क से दीजिए। लाठी से किसी के हाथ से किताब छीनी जा सकती है, उसके भीतर पैदा हो चुके सवाल को नहीं और शायद यही बात हमें सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है, लोकतंत्र में नागरिक से यह नहीं पूछा जाता कि उसने क्या पढऩे की इजाजत ली थी, लोकतंत्र यह सुनिश्चित करता है कि वह पढ़ सके, सोच सके और अपनी समझ बना सके, क्योंकि जिस दिन किसी समाज में यह तय होने लगे कि कौन क्या पढ़ेगा, कौन क्या देखेगा और कौन क्या सोचेगा, उस दिन लोकतंत्र का सबसे बड़े खतरे में होगा।



