आयोग के हस्तक्षेप से मिली पहचान: दशकों से वंचित पारधी परिवारों को ढाई माह में मिला कानूनी हक़ - realtimes
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आयोग के हस्तक्षेप से मिली पहचान: दशकों से वंचित पारधी परिवारों को ढाई माह में मिला कानूनी हक़

कांकेर/रायपुर: छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की निर्णायक पहल और निरंतर निगरानी ने कांकेर जिले के रिसेवाड़ा गाँव में बसे पारधी जनजाति के परिवारों के जीवन में एक नया सवेरा लाया है। दशकों से अपनी पहचान और मूलभूत कानूनी अधिकारों से वंचित इन परिवारों को महज ढाई महीने की कार्यवाही में न केवल उनके अधिकार मिले, बल्कि उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की एक ठोस नींव भी रखी गई है।

मामले का खुलासा तब हुआ जब दैनिक समाचार पत्रों ‘कांकेर पत्रिका’ और ‘नवभारत’ में प्रकाशित खबरों तथा ‘सृजन समिति’ के सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत आवेदन के माध्यम से यह तथ्य आयोग के संज्ञान में आया। कांकेर जिला मुख्यालय से मात्र 25 किलोमीटर दूर आरक्षित वन क्षेत्र में कोण्डागांव से आकर बसे ये पारधी परिवार वोटर आई.डी. कार्ड, आधार कार्ड, और राशन कार्ड जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना जीवनयापन कर रहे थे।

आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल संज्ञान लिया और प्रकरण क्रमांक 1307/2025 के तहत इसे दर्ज किया। उन्होंने जिला कलेक्टर, उत्तर बस्तर कांकेर को राजस्व, वन, पुलिस, आदिम जाति कल्याण और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों का एक संयुक्त दल गठित कर इन परिवारों तक पहुँचने और उन्हें सभी आवश्यक सरकारी दस्तावेज़ एवं सुविधाएँ उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

जिला प्रशासन ने तुरंत हरकत में आते हुए पाँच सदस्यीय दल का गठन किया, जिसने गाँव पहुँचकर सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण में पारधी जनजाति के 6 परिवारों के कुल 34 सदस्य वहाँ निवासरत पाए गए। आयोग के लगातार अनुश्रवण के परिणामस्वरूप, प्रशासन ने त्वरित कार्यवाही करते हुए अधिकांश परिवारों के वोटर आई.डी., आयुष्मान कार्ड और राशन कार्ड बनवा दिए हैं। एक परिवार के दस्तावेज़ अधूरे होने के कारण प्रक्रिया जारी है, जिसे जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा।

आयोग ने अपनी कार्यवाही केवल दस्तावेज़ बनवाने तक ही सीमित नहीं रखी है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितम्बर 2025 को निर्धारित की गई है, जिसमें जिला प्रशासन को सभी परिवारों को समस्त सुविधाएँ दिए जाने की लिखित पुष्टि प्रस्तुत करनी होगी। इसके अतिरिक्त, आयोग ने वन विभाग के संबंधित अधिकारियों को भी तलब किया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आरक्षित वन क्षेत्र में निवासरत इन परिवारों के अधिकारों के लिए विभाग द्वारा अब तक क्या कदम उठाए गए थे।

डॉ. वर्णिका शर्मा ने बताया, “हमारा लक्ष्य केवल एक मामले का निपटारा करना नहीं, बल्कि प्रदेश में इस तरह के सभी वंचित परिवारों की पहचान कर उन्हें उनके अधिकार दिलाना है।” इसी उद्देश्य से आयोग द्वारा वन विभाग को पत्र लिखकर पूरे प्रदेश में ऐसे परिवारों का सर्वेक्षण करने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की पहल करने के लिए कहा जा रहा है।

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