छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के प्रति अटूट आस्था

शारदीय नवरात्रि एवं दशहरा उत्सव पर विशेष आलेख
लेखक- एन.डी. मानिकपुरी
सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता
छत्तीसगढ़ में देवी और भगवान श्रीराम के प्रति गहरी आस्था है। यहां भगवान श्रीराम और देवी की आराधना का विशेष महत्व है। देवी को प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के साथ-साथ उनके अवतार के रूप में पूजा जाता है। हर क्षेत्र में पूजा की विधि अलग-अलग होती है। वहीं, भगवान श्रीराम के वनवास काल के दौरान छत्तीसगढ़ में बिताए गए समय और उनसे जुड़े साक्ष्यों को आधार बनाकर भी पूजा की जाती है। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ का गहरा प्रभाव है, जो आम जनजीवन में विशेष रूप से देखा जा सकता है। एक वर्ग ‘रामनामी’ अनुयायियों का भी है, जो भगवान श्रीराम की विशेष तरीके से पूजा करते हैं। भगवान श्रीराम और देवी की आराधना ने छत्तीसगढ़ को एक अनोखी सांस्कृतिक पहचान दी है, जो निरंतर प्रगति पर है। छत्तीसगढ़ की विभिन्न शक्तिपीठों में नवरात्रि उत्सव, ज्योति-जवांरा की स्थापना, जसगीत, मानस गान और बस्तर दशहरा उत्सव जैसी सांस्कृतिक धरोहरों ने राज्य को विश्व पटल पर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान दी है।
प्राचीन मान्यताएं
देश के अन्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी दशहरा उत्सव से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं। विजयदशमी और दशहरा के संबंध में शास्त्रों में बताया गया है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का अंत हुआ था। उसी दिन भगवान श्रीराम ने दशानन रावण का वध किया और अयोध्या में विजय पर्व मनाया गया। उस दिन भगवान श्रीराम ने शमी वृक्ष की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें नीलकंठ रूप में दर्शन दिए। इसीलिए नीलकंठ के दर्शन को शुभ माना जाता है। इसी तरह शारदीय नवरात्रि के अंत में मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। इन दोनों कारणों से विजयदशमी और दशहरा मनाया जाता है।
राज परिवार की भूमिका
छत्तीसगढ़ का नाम यहां स्थित 36 गढ़ों (छोटे राज्यों) के कारण पड़ा। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, शिवनाथ नदी के दोनों ओर लव-कुश का राज्य था, जो बाद में कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। दशहरा उत्सव को स्थानीय राजाओं के नेतृत्व में मनाए जाने की परंपरा रही है, जो आज भी जारी है। विभिन्न नगरों में राज परिवार की उपस्थिति में दशहरा मनाया जाता है। बस्तर का दशहरा उत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो हरियाली अमावस्या से शुरू होकर विजयदशमी को समाप्त होता है।
छत्तीसगढ़ में प्रभाव
छत्तीसगढ़ में देवी आराधना का संबंध प्रकृति पूजा से लेकर ग्राम देवी, जल देवता, शाकंभरी देवी और अन्नपूर्णा से होता है। प्रमुख शक्तिपीठों जैसे दंतेश्वरी (दंतेवाड़ा), बम्लेश्वरी (डोंगरगढ़), चंद्रहासिनी (चंद्रपुर) और अन्य देवी स्थानों में ज्योति कलश की स्थापना होती है। मान्यतानुसार, लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। दशहरा उत्सव के दौरान देवी जसगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। कई स्थानों पर रामलीला का मंचन भी होता है।
रावण के उपदेश
जब रावण मृत्युशैया पर था, तब भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को उनके पास जाकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए कहा। रावण ने लक्ष्मण को सिखाया कि किसी भी शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए, जबकि अशुभ कार्यों को जितना टाला जा सके, उतना बेहतर होता है। उन्होंने यह भी कहा कि कभी अपनी शक्ति और पराक्रम पर इतना गर्व न करें कि शत्रु को तुच्छ समझने की भूल कर बैठें। रावण ने यह भी उपदेश दिया कि हमें अपने मित्र और शत्रु की पहचान करनी आनी चाहिए। साथ ही, जीवन के गूढ़ रहस्यों को किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए, चाहे वह कितना भी करीबी क्यों न हो।
अंत में रावण ने लक्ष्मण को बताया कि पराई स्त्री पर कभी बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए, क्योंकि ऐसा व्यक्ति अवश्य नष्ट हो जाता है। इन उपदेशों को ध्यान में रखते हुए, विजयदशमी के इस अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने भीतर के सभी दोषों और बुराइयों का अंत करेंगे, ताकि समाज में सुख और समृद्धि का प्रसार हो सके।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से भी उम्मीद है कि वे राज्य के लोगों को भयमुक्त और सुरक्षित वातावरण प्रदान करेंगे। इसी के साथ, आप सभी को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।



