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गैर-कानूनी तरीके से अफ्रीकी चीतों को भारत में बसाने की है योजना, लेकिन सरकार के लिए सब माफ

योजना के मुताबिक, 30-40 वर्षों में चीतों की संख्या को 36 करने का लक्ष्य है। महज 36 चीतों के लिए तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करते हुए 3,200 वर्ग किलोमीटर इलाके को सुरक्षित किया जाना है। इसकी तुलना में, पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों को बचाने का कार्यक्रम देखें। यह योजना यहां 7 बाघों को रखने से शुरू हुआ और 12-13 वर्षों में इनकी आबादी बढ़कर 70 हो चुकी है। ये बाघ लगभग 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रह रहे हैं, यानी पन्ना टाइगर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल (1578 वर्ग किलोमीटर) के आधे इलाके में।

इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि कूनो कभी बाघों का घर हुआ करता था और यहां 3,200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 350 से अधिक बाघ रह सकते हैं, यानी मध्य प्रदेश में बाघों की कुल आबादी का 70 फीसद। मध्य प्रदेश में बाघ अभयारण्यों का कुल इलाका 10,208 वर्ग किलोमीटर है जिसमें बफर जोन और गांव भी हैं और इसके मुकाबले 3,200 वर्ग किलोमीटर कितना बड़ा इलाका है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है और इतने बड़े इलाके को सिर्फ 36 चीतों के लिए सुरक्षित किया जा रहा है!

योजना यह है कि एक बार जब चीता यहां के माहौल में रच-बस जाएं तो यहां उन्हें बाघों और शेरों के साथ रखा जाएगा। लेकिन इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। चीता कार्ययोजना को बड़ी सावधानी से तैयार किया गया है और इसमें इस तरह के प्रावधान किए गए हैं कि खराब से खराब स्थिति में भी परियोजना को तकनीकी रूप से विफल नहीं माना जा सके। सफलता का मानदंड इस तरह तय किया गया है कि अगर कुल रखे गए चीतों में से आधे भी बच जाते हैं तो परियोजना को सफल माना जाएगा। परियोजना तभी विफल मानी जाएगी जब सभी चीतों की पांच साल के भीतर मृत्यु हो जाए, और कार्ययोजना में कहा गया है कि बीच-बीच में अफ्रीका से और चीते लाए जाते रहेंगे। ऐसी स्थिति में संबंधित विशेषज्ञों को जवाबदेह ठहराना बहुत ही मुश्किल होगा।

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