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तेज़ आवाज़ की वजह से पहले युनिवर्सिटी ने लेक्चरर को नौकरी से निकाला, फिर कोर्ट ने सुनाया ये फैसला

तेज़ आवाज़ की वजह से पहले युनिवर्सिटी ने लेक्चरर को नौकरी से निकाला, फिर कोर्ट ने सुनाया ये फैसला

यूके में एक विश्वविद्यालय की लेक्चरर को केवल इसलिए नौकरी से निकाल दिया गया, क्योंकि उसकी आवाज तेज है और वो छात्रों से ऊंची आवाज़ में बात करती है. जिसके बाद लेक्चरर ने यूनिवर्सिटी के इस फैसले के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अब कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया है. अदालत ने बतौर क्षतिपूर्ति उन्हें 100,000 पाउंड (1,01,53,080 रुपए) देने का भी आदेश दिया है. बता दें कि वरिष्ठ अकादमिक, डॉ एनेट प्लाट, एक्सेटर विश्वविद्यालय में 29 वर्षों से ज्यादा समय से काम कर रही थीं, जब उन्हें संस्था द्वारा निकाल दिया गया था. उन्होंने दावा किया कि डॉ प्लाट को उनकी तेज आवाज के कारण विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में उनके पद से बर्खास्त कर दिया गया था. अपनी शिकायत में, डॉ प्लाट ने न केवल विश्वविद्यालय पर “संस्थागत रूप से अनजाने में पक्षपाती” होने का आरोप लगाया, बल्कि यह भी कहा कि उन्हें तनाव से निपटने के लिए चिकित्सा सहायता भी लेनी पड़ी. 

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एनेट प्लाउट ने अपने बचाव में कोर्ट से कहा, कि वो पूर्वी यूरोपीय यहूदी परिवार से ताल्लुख रखती हैं. उन्हें अपनी बातों और विचारों को पुरजोर तरीके से रखने की सीख दी गई है. वो जानबूझकर किसी को परेशान करने के लिए तेज आवाज में नहीं पढ़ातीं, बल्कि उनकी आवाज ही ऐसी है. द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, उसने दावा किया कि वो यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर (University of Exeter) के फिजिक्स डिपार्टमेंट में 30 साल से पढ़ा रही थीं. उन्हें विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में शामिल होने वाली पहली महिला अकादमिक होने का सम्मान भी प्राप्त है.

मिरर में एक रिपोर्ट के अनुसार, फिजिक्स टीचर को पहले निलंबित किया गया फिर दिसंबर 2019 में अनुशासनात्मक सुनवाई के बाद यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया गया कि उन्होंने पीएचडी छात्रों पर चिल्लाया था, जिसकी वजह से वे तनाव में आ गए. संस्था ने स्पष्ट रूप से इनकार किया कि बर्खास्तगी का उसकी पृष्ठभूमि या उसके लिंग से कोई लेना-देना नहीं था.

हालांकि, रोजगार न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया कि उसे गलत तरीके से बर्खास्त कर दिया गया था. तब विश्वविद्यालय को डॉ प्लाट को 100,000 पाउंड का भुगतान करने का आदेश दिया गया था. डॉ प्लाट ने कहा कि उनका मानना ​​था कि यह “विश्वविद्यालय और मानव संसाधन के कुछ वरिष्ठ सदस्यों” की रूढ़िवादी धारणा थी कि एक महिला को कैसे व्यवहार करना चाहिए जिससे उन्हें हटा दिया गया.

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