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जीत के बाद भी जारी है देश का किसान आंदोलन

रायपुर(realtimes) देश भर में जिस अभूतपूर्व, असाधारण, ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने कल एक वर्ष पूरा किया है, उसने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली कारपोरेट बंधुआ सरकार को निर्णायक रूप से पराजित किया है। प्रधानमंत्री मोदी को अंततः उन तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी है, जो भारत देश की खेती और खाद्यान्नों के व्यापार को अमरीकी और भारतीय कारपोरेट कंपनियों के कब्जे में ला रही थी। मगर किसान आंदोलन अभी जारी है, क्योंकि इस किसान आन्दोलन की शुरुआत तीन कानूनों के काफी पहले 2017 में हुए मंदसौर के गोलीकांड में 6 किसानों की शहादत से हुयी थी। किसान आंदोलन की मुख्य मांग स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप एमएसपी का निर्धारण, उसकी गारंटी का क़ानून बनाने और कर्जा मुक्ति की थी। अब इसमें प्रस्तावित बिजली क़ानून की निरस्ती, लखीमपुर खीरी हत्याकांड में दफा 120 के अभियुक्त केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री टेनी मिश्रा की गिरफ्तारी तथा बर्खास्तगी, इस आंदोलन के दौरान लगे मुकदमो की वापसी, आंदोलन में हुए 700 शहीदों के परिजनों को मुआवजा देने तथा उनका स्मारक बनाये जाने की मांगे भी जुड़ गयी हैं। यह किसान आंदोलन इन मांगों के पूरा होने तक जारी रहेगा।

भारत का किसान 2015 में भूमि अधिग्रहण क़ानून को वापस कराने की लड़ाई भी जीता था, तीन कृषि कानूनों को वापस करवाने की लड़ाई भी जीता है, अब अपने एकजुट संघर्षों से बाकी मांगों को भी जीतेगा।

सिलगेर का संघर्ष देश के किसान आंदोलन का 7वां मोर्चा है

दिल्ली और देश में जारी किसान आंदोलन और सिलगेर में पिछले साढ़े छह महीनों – 12 मई 2021 – से जारी आदिवासियों का आंदोलन एक जैसा हैं। दोनों ही जल-जंगल-जमीन और जीवन पर अमरीकी-अम्बानी-अडानी के कारपोरेट कब्जे के खिलाफ हैं। दोनों ही भारत के संविधान और लोकतंत्र की हिफाजत के लिए हैं। दोनों ही आंदोलन कारपोरेट नियंत्रित सरकारों के द्वारा जनता पर किये जा रहे दमन के विरुद्ध हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा और अखिल भारतीय किसान सभा सिलगेर के आंदोलन को दिल्ली की बॉर्डर पर लगे 6 मोर्चों के अलावा दिल्ली से 1570 किलोमीटर दूर लगा अपना 7वां मोर्चा मानता है और इसका पूरा समर्थन करता है। हम इस आंदोलन के प्रतिनिधियों को दिल्ली आने के लिए आमंत्रित करने आये हैं। हमे ख़ुशी है कि उन्होंने दिल्ली की बॉर्डर्स पर आने का हमारा न्यौता कबूल कर लिया।

लोकतंत्र बहाल करे छग सरकार

समूचे बस्तर में हर ढाई किलोमीटर पर सीआरपीएफ कैम्प – पुलिस छावनियां और थानों का जाल बिछाना अनौचित्यपूर्ण कार्यवाही है। लोकतंत्र में राजनीतिक समस्याओं के समाधान पुलिस स्टेट बनाकर नहीं निकाले जा सकते, राजनीतिक तरीके से ही निकाले जा सकते हैं। खाकी के फूहड़ प्रदर्शन और आम आदिवासियों तथा नागरिकों की जिंदगी दूभर बनाने की बजाय छग सरकार को इस इलाके की जनता का विश्वास जीतना चाहिए। उन्हें मानवोचित जीवन की सुविधाएं और सारे संविधानसम्मत अधिकार दिए जाने चाहिये। हर ढाई किलोमीटर पर लाइब्रेरीज, स्कूल और अस्पताल बनाने चाहिए, ताकि मलेरिया और कुपोषण जैसी टाली जा सकने वाली हजारों मौतों से आदिवासियों को, उनकी समृद्ध संस्कृति तथा विरासत को बचाया जा सके। छत्तीसगढ़ सरकार ने संविधान दिवस पर लोकतंत्र और संविधान को मखौल बनाकर रख दिया है। देश के सबसे बड़े किसान संगठन के प्रतिनिधि के नाते कल जब हम सिलगेर के किसानों से मिलने जा रहे थे, तब हमें भी बीसियों पुलिस चौकियों में रोका गया। जागरूक पत्रकारों की मदद से ही हम संविधान दिवस के दिन अपने ही देश में, अपने ही देश के नागरिकों से मिलने पहुँच पाये। यह सरासर बेहूदगी और अलोकतान्त्रिकता है।

यह मौतें भी लखीमपुर खीरी जैसा हत्याकाण्ड है

सिलगेर में 17 मई को हुआ गोलीकाण्ड अनावश्यक था। छग के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लखीमपुर खीरी के निर्मम हत्याकांड में मारे गए 4 किसानो और 1 पत्रकार की हत्या पर वहाँ जाकर संवेदना व्यक्त की है और हरेक पीड़ित परिवार को छग सरकार की ओर से 50-50 लाख रूपये की राहत राशि घोषित करने का सही काम किया है, लेकिन खेद की बात है कि वे भूपेश बघेल खुद अपने ही राज्य में मार डाले गए 3 युवकों, एक युवती और उसके गर्भस्थ शिशु की गोलीकांड में हुयी हत्या के बाद आदिवासियों के प्रति सहानुभूति दिखाने आज तक उनके बीच नहीं पहुंचे हैं। यह दोहरा आचरण है। उन्हें ठीक उसी तरह का बर्ताब बस्तर के इन भारतीयों के साथ भी करना चाहिये। हम मांग करते हैं कि 17 मई के गोलीकाण्ड की न्यायिक जाँच की जाये, मृतकों के परिजनों को एक-एक करोड़ रूपये, घायलों को 50-50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाये और दोषियों को दण्डित जाए।

इसी के साथ सारकेगुड़ा, एडसमेटा जैसे गोलीकांडों की जो जांच रिपोर्ट्स आ चुकी हैं, उन पर तथा सीबीआई, मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग की सलवा जुडूम के दौरान आदिवासियों पर किये अत्याचारों पर जो रिपोर्ट्स आ चुकी हैं, उन रिपोर्ट्स में चिन्हित दोषी अधिकारियों को सजा दी जाये।

बड़े एजेंडे का हिस्सा है बस्तर दमन

अखिल भारतीय किसान सभा और देश का किसान आंदोलन मानता है कि केंद्र सरकार का असली इरादा बस्तर को आदिवासी और परम्परागत वनवासी विहीन बनाने का है, ताकि यहां के जंगल, खनिज, नदियाँ और प्राकृतिक सम्पदा को अडानी और अम्बानी का खजाने भरने के लिए सौंपा जा सके। इसके लिए संविधान और लोकतंत्र को ध्वस्त किया जा रहा है। कारपोरेट के चाकरों को प्रशासनिक पदों पर बिठाया जा रहा है। देश के किसान सिलगेर के आदिवासियों के साथ हैं, वे केंद्र और राज्य सरकारों को इन साजिशों में कामयाब नहीं होने देंगे। हम पेसा कानून को उसकी सही भावना में क्रियान्वित करने की भी मांग करते हैं, ताकि पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन कायम किया जा सके।

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