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13 लाख क्विंटल धान बर्बाद,सड़ा, सूखा या भीगकर हुआ खराब, हिसाब-किताब प्रोसेस में है

रायपुर(anwar qureshi@realtimes)। छत्तीसगढ़ में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीदे गए धान में से क्या 13 लाख क्विंटल टन धान सड़ गया, सूख गया या किसी और तरीके से बरबाद हो गया है। अगर ये सही है तो यह राज्य में अन्न की बड़ी नुकसानी है। धान खरीद केंद्रों में स्टाक (स्कंध) की समाप्ति के बाद हर जिले में धान का हिसाब-किताब निकालने की प्रक्रिया से उपजे आंकड़ों से ये तस्वीर सामने नजर आ रही है। हालांकि राज्य स्तर पर इस व्यवस्था के संचालक विभाग के अधिकारियों के दावों को मानें तो यह गुणा-भाग अभी फायनल नहीं हुआ है, एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है अभी यह हिसाब किताब प्रोसेस में है यानी प्रक्रिया में है। मानें कि ये आंकड़ा घट या बढ़ सकता है। पर सवाल ये कि घटेगा तो कैसे,…बढ़ेगा.. ये हो सकता है।

राज्य में वर्ष 2021 में एमएसपी पर खरीदे गए धान की 2 हजार 147 खरीद केंद्र(उपार्जन केंद्र) के माध्यम से की गई थी। यहां किसानों से धान खरीदकर उन्हें पेमेंट करने के बाद धान रखा गया था। धान को उठाने यानी परिवहन कर ले जाने का काम मार्कफेड के हवाले था। सोसायटियों से एग्रीमेंट के मुताबिक खरीदा गया धान 72 घंटे में करना था। यह काम देरी से हुआ। हफ्ता, दस, बीस दिन नहीं बल्कि महीनों की देरी हुई। हालांकि इस बीच अप्रैल मई में कोरोना की दूसरी लहर भी आई,इससे राज्य में परिवहन का सामान्य कामकाज प्रभावित हुआ। इसके बाद जून से बारिश शुरू हो गई। जाहिर है बारिश में धान भीगकर और इससे पहले मार्च से अप्रैल मई तक धान सूख कर कम हो गया। इसे सूखत कहा जाता है। दिलचस्प ये है कि धान अगर भीग कर खराब हो या सूख कर रिकार्ड में उसे सूखत के रूप में दर्ज करने की व्यवस्था है। केंद्र सरकार सूखत के रूप में 1 प्रतिशत हानि को मान्य करती है। धान जब खरीदा जाता है तो उसमें 17 प्रतिशत नमी होती है। सूखने से धान का वजन कम होता है।

16 तारीख तक के हिसाब में निकली है गडबड़ी

धान खरीदी का हिसाब किताब खरीदी समाप्त होने के बाद से लगातार और रोजाना किया जाता है। इसी क्रम में जुलाई में 2147 उपार्जन केंद्रों में से 1543 का हिसाब पूरा यानि स्कंध की समाप्ति हुई तो भी सूखत और धान की कमी का आंकड़ा 7 हजार मीट्रिक टन के पार था। इसके बाद 16 सितंबर को 2147 उपार्जन केंद्रों का हिसाब पूरा हुआ तो यह आंकड़ा बढ़कर 13 हजार मीट्रिक टन के पार जाने की खबर है। इस हानि के संबंध में मार्कफेड ने आधिकारिक रूप से कोई ब्योरा जारी नहीं किया है। लिहाजा अब मार्कफेड के अधिकारी कह रहे हैं कि आंकड़े अभी फाइनल नहीं हुए हैं, अभी यह प्रोसेस में है।

इन जिलों में सर्वाधिक

वैसे से पूरे प्रदेश की सभी सोसायटियों में मोटा,पतला और सरना धान की मात्रा में कमी आई है, लेकिन जानकारों के अनुसार सबसे ज्यादा बिलासपुर,सुकमा.बेमेतरा,कवर्धा, और बलौदाबाजार में धान कम हुआ है। जिन जिलों में धान की सूखत में कोई कमी नहीं आई है उनमें दंतेवाड़ा,कोरबा,जशुपर,

500 करोड़ बचाने हजार करोड़ का घाटा

सहकारिता के जानकार सूत्रों के मुताबिक धान की बरबादी के पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि उपार्जन नीति में भारी गड़बड़ी है। एक पूर्व मुख्य सचिव ने अपने कार्यकाल में व्यवस्था बनवा दी कि धान खरीद केंद्र से मार्कफेड के संग्रहण केंद्र में लाने की जगह सीधे मिलर को दे दिया जाए। यह करने से मार्कफेड को 500 करोड़ रुपए परिवहन व्यय में बचने की संभावना बता दी। अब धान खरीद केंद्रों यानि उपार्जन केंद्रों से मिलरों को देने की व्यवस्था बना तो दी लेकिन खरीद केंद्रों से ही धान का परिवहन नहीं हो सका। वहां धान सूखा,सड़ा. चूहे खा गए। इस 500 करोड़ को बचाने के चक्कर में क्या हजार करोड़ के धान का नुकसान सहनीय है।

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