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सहकारी समितियों को भंग करना सरकार का अलोकतांत्रिक कदम – अशोक बजाज

रायपुर(realtimes) भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ के संयोजक अशोक बजाज ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार प्राथमिक समितियों के पुनर्गठन की आड़ में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित बोर्ड को भंग करना चाहती है। सरकार की यह मंशा पूर्णत: अलोकतांत्रिक एवं असंवैधानिक है।

श्री बजाज ने कहा कि सन् 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल  में संविधान के 97 वें संविधान संशोधन के द्वारा सहकारी समितियों के बोर्ड का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया है लेकिन दुख की बात है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार यूपीए सरकार के कार्यकाल के समय किये गये प्रावधान को नहीं मान रही है। उन्होंने कहा कि अधिकांश समितियों का निर्वाचन जुलाई 2017 में हुआ है यानी उनका कार्यकाल अभी 3 वर्ष बाकी है। जबकि कतिपय समितियों का निर्वाचन अभी 6 माह के अंदर हुआ है।

श्री बजाज ने कहा कि राज्य सरकार संविधान और अधिनियम के विरूद्ध कोई नियम नहीं बना सकती और ना ही योजना लागू कर सकती है। उन्होंने कहा कि सहकारी सोसाइटी अधिनियम 1960 की धारा 16ग में सरकार को केवल पुनर्गठन की स्कीम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। लेकिन राज्य शासन ने 16ग को गलत ढंग से परिभाषित कर निर्वाचित संचालन मंडल को भंग करने का प्रावधान कर लिया है जो कि पूर्णत: अवैधानिक है। श्री बजाज ने कहा कि सहकारी समितियां स्वेच्छिक एवं स्वायत्त संस्थायें हैं जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं प्रावधानों के तहत निर्वाचित संचालन मंडलों को भंग करना पूर्णत: अलोकतांत्रिक कदम है।

उन्होंने मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन के बाद विधानसभा भंग नहीं की गई बल्कि कुल 320 विधायकों में से 230 विधायकों को मिलाकर मध्यप्रदेश विधानसभा तथा 90 विधायों को मिलाकर छत्तीसगढ़ विधानसभा का गठन किया गया था। इसी प्रकार राज्य पुनर्गठन के समय राज्य की शीर्ष संस्थाओं का विभाजन भी हुआ था लेकिन तत्समय निर्वाचित संचालन मंडल को भंग नहीं किया गया था, जो छत्तीसगढ़ से संचालक निर्वाचित थे उन्हें छत्तीसगढ़ की शीर्ष सोसाइटियों का संचालक बनाया गया था तथा शेष लोग म.प्र. के संचालक मंडल में रह गये थे। श्री बजाज ने कहा कि वर्तमान में सहकारी सोसाइटियों के पुनर्गठन के समय में इसी प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए।

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