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देवेन्द्र सिंह चौहान ने लोगों के तानों के बीच ब्रेललिपी सीखी और फिर इस तरह बन गए RAS अधिकारी ?

लाइफस्टाइल डेस्क। राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS-2018) के परिणाम के बाद देशभर में सफल उम्मीदवारों के चयन की कहानियां शेयर की जा रही हैं। सोशल मीडिया पर संघर्ष से सफलता की इनकी कहानी लाखों युवाओं को प्रेरित कर रही है। सक्सेज स्टोरी की इस सीरीज में आज हम एक और आरएएस चयनित उम्मीदवार के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिसने आंखें नहीं होने के बावजूद अपने सपनों को पूरा किया। रोशन चली गई तो ब्रेललिपी तक सीखी और कठोर मेहनत कर आखिरकार वो कर दिखाया जिसके बारे में लोग सोच भी नहीं सकते।


 नेत्रहीन युवा देवेंद्र चौहान राजस्थान के अलवर जिले के बानसूर के निवासी हैं। आरएएस परीक्षा में ब्लाइंड कैटेगरी में इन्होंने सफलता हासिल की है। देवेन्द्र को ओवरआल ब्लाइंड कैटेगरी में छठी रैंक मिली है। पत्नी अंकिता चौहान ने देवेंद्र का हर कदम पर बखूबी साथ दिया। वे उनकी तैयारी कराती रहीं। देवेंद्र 2006 में जब छठी क्लास में थे तब कक्षा में बैठे-बैठे ही आंखों की रोशनी चली गई। बहुत इलाज कराया लेकिन फायदा नहीं हुआ। गरीब थे इसलिए कानबेलिया से इलाज कराया, उसने ऐसा सुरमा डाला कि आंखों की बची हुई रोशनी भी चली गई। अंधहीन होने के कारण लोग कहने लगे कि आंखें चली गई तो संसार चला गया। सलाह देने लगे कि देवा को वृंदावन या गोवर्धनजी छोड़ दो। वहां भीख मांगकर खा लेगा। इसे कौन बैठाकर जिंदगीभर खिलाएगा। लेकिन देवेन्द्र ने हार नहीं मानी। उनका सपना कुछ ही था। जहां मेहनत तो थी लेकिन लक्ष्य अडिग था। 

हालांकि, उनके बड़े सपने थे और उन्होंने काम करके फंड इकट्ठा करना शुरू कर दिया। रेडियो से नेत्रहीनों के लिए एक स्कूल का नंबर मिलने के बाद वे जयपुर आए और ब्रेल भाषा सीखी। जब उन्होंने आरएएस की तैयारी शुरू की तो कई लोगों ने भद्दी टिप्पणियां कीं, लेकिन इससे उनका मनोबल नहीं टूटा और आखिरकार उन्होंने आरएएस-2018 को क्वालिफाई कर लिया। सबसे खास बात तो ये है कि सफलता मिलने के बाद भी उनका लक्ष्य अभी भी कुछ और ही है। वे अब आईएएस बनना चाहते हैं। 
 

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