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ट्रकाें के संचालक फंसे, न चल रहीं, न बिक रहीं, जाएं ताे जाएं कहां…..

रायपुर(realtimes) ट्रकों का परिवहन का एक समय बहुत फायदे का साैदा हाेता था। इसके परिवहन के लिए कई संचालकों ने सैकड़ाें ट्रकें लेकर रखीं हैं, लेकिन एक तरफ कोरोना के कहर के कारण मंदी का दौर तो दूसरी तरफ डीजल की लगातार बढ़ती कीमत की मार। इस दोहरी मार ने प्रदेश के साथ देश भर के ट्रक ट्रांसपोर्टरों की कमर तोड़ कर रख दी है। सही मालभाड़ा न मिल पाने के कारण सभी परेशान हैं। अब तो स्थिति यह हो गई है कि 70 फीसदी ने इस कारोबार को छोड़ने का मन बना लिया है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह कि जो लोग कारोबार छोड़ना चाहते हैं, उनकी ट्रकें लेने वाले भी नहीं मिल रहे हैं। कारोबार में कमाई न होने के कारण कोई दूसरा भी इस कारोबार से जुड़ना नहीं चाहता है। प्रदेश में तीन लाख ट्रक संचालकों के साथ करीब 15 लाख लोग इस कारोबार से जुड़े हैं जो प्रभावित हो रहे हैं। इस समय मुश्किल से 30 फीसदी ट्रकों का ही संचालन हो रहा है।

एक तरफ कोरोना के कहर ने जहां ट्रक ट्रांसपोर्टिंग कारोबार की हालत पतली की है, वहीं डीजल की लगातार बढ़ती कीमत ने तो इस कारोबार को अब चौपट करने का काम कर दिया है। इस कारोबार से जुड़े लोगों का साफ कहना है, अब ट्रांसपोर्टर काम घाटे का सौदा बन गया है। कमाई के नाम पर इसमें कुछ नहीं रह गया है। ऐसे में अब इस कारोबार से सब अलग होने के रास्ते तलाश रहे हैं।

कमाई पर ग्रहण

ट्रकों का संचालन करने वाले उदाहरण देकर बताते हैं कि एक ट्रिप में मुश्किल से दो हजार बच पा रहे हैं। यहां से विशाखापट्टनम जाने का उदाहरण देते हुए बताते हैं, 15 सौ रुपए टन के हिसाब से 37 हजार पांच सौ मिलते हैं। 25 हजार का तो डीजल ही लग जाता है। इसके अलावा चार हजार के आस-पास टोल नाकों का शुल्क लगता है। रास्ते का खर्च और ड्राइवर और क्लीलर का खर्च मिलाकर पांच हजार हो जाते हैं। सब खर्च मिलाकर 35 हजार के आस-पास खर्च हो जाता है। बचते हैं दो से ढाई हजार। इतनी दूरी तक जाने में ट्रक के चक्कों की घिसाई और मेंटेनेंस का खर्च जोड़ा जाए तो कुछ नहीं बचता है।

रेलवे ने कम कर दिया भाड़ा

ट्रांसपोर्टरों के मुताबिक एक तो वैसे ही मानसून में सड़क के रास्ते ज्यादा परिवहन नहीं होता है, जो कुछ होता है, उस पर भी रेलवे के ऑफर के कारण कुछ नहीं बचता है। रेलवे मानसून में 20 फीसदी छूट देता है। ऐसे में जब रेलवे से माल भेजने पर 11 से 12 सौ रुपए टन का खर्च पड़ता है तो कोई 15 सौ रुपए टन खर्च करके सड़क मार्ग से क्यों माल भेजेगा।

अब केंद्र सरकार से उम्मीद

आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्टर ने कारोबार को बचाने के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाने का फैसला किया है, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई मांगें करने का फैसला किया गया है। इसमें सबसे अहम डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के साथ पूरे देश में इसकी एक कीमत रखने की मांग है। इसके अलावा ट्रांसपोर्टरों की छह माह की बैंकों की किस्तों की छूट देने की मांग के साथ इस पर ब्याज न लेने की भी मांग है। इसी के साथ कुछ और मांगें भी हैं।

जाएं ताे जाएं कहां

आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्टर कांग्रेस के सुखदेव सिंह सिद्धू का कहना है, 70 फीसदी ट्रक संचालक अब ट्रांसपोर्टर के कारोबार से किनारा करना चाहते हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह कि जो कारोबार नहीं करना चाहते हैं उनके ट्रकों के लेवाल भी नहीं है। ऐसे में सभी लोग फंस गए हैं। इसके पास कोई रास्ता नहीं है, सरकार ने मदद नहीं की तो सब सड़क पर आ जाएंगे।

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