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सिर्फ सजा देकर सियासत में भाषा की मर्यादा बरकरार नहीं रखी जा सकती: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

इंदौर। देश के राजनेताओं में भाषा की लक्ष्मण रेखा लांघने की प्रवृत्ति बढ़ने पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने चिता जताई है। हालांकि, उनका मानना है कि केवल दंडात्मक कदमों के बूते राजनीति में शब्दों की मर्यादा बरकरार नहीं रखी जा सकती और राजनेताओं को अध्ययन की संस्कृति से जोड़ा जाना समय की मांग है ताकि बुनियादी मुद्दे तथा नीतियां सियासी विमर्श के केंद्र में आ सकें।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह बात ऐसे वक्त कही है जब मध्यप्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर तीन नवंबर को होने वाले उपचुनावों के प्रचार के दौरान राजनेताओं को उनके विपक्षियों के लिए गद्दार, बिकाऊ, भूखे-नंगे परिवार का, आइटम, रखैल और लुच्चे-लफंगे जैसे निचले स्तर के शब्दों का इस्तेमाल करते देखा गया है।

रावत ने एक साक्षात्कार में 'पीटीआई-भाषा से कहा, चुनाव प्रचार के दौरान अभद्र या भड़काऊ भाषा के इस्तेमाल के खिलाफ आदर्श आचार संहिता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में पर्याप्त प्रावधान हैं, लेकिन देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर मेरा मानना है कि केवल दंडात्मक प्रावधानों के बूते इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर स्थायी रोक नहीं लगाई जा सकती।

उन्होंने कहा कि अभद्र या भड़काऊ भाषा के इस्तेमाल के मामलों में आम तौर पर संबंधित राजनेता को कुछ दिनों के लिए चुनाव प्रचार से रोक दिया जाता है। लेकिन देखा गया है कि चुनाव प्रचार के भाषाई स्तर में सुधार के उद्देश्य में ऐसे कदम लम्बे समय तक सफल नहीं हो पाते और कुछ वक्त बाद राजनेताओं की जुबान फिर बेकाबू होने लगती है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने जोर देकर कहा, हमें समझना होगा कि सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में राजनेताओं के पास अपना ज्ञान बढ़ाने के अवसर खत्म-से हो गए हैं। उनके पास पढ़ने-लिखने और कुछ नया जानने के लिए जैसे समय ही नहीं है।

उन्होंने कहा, हमें भाषा के ऊंचे पैमानों पर ठोस राजनीतिक विमर्श को बढ़ावा देने के लिए ऐसे अवसर पैदा करने होंगे जिनके जरिये राजनेता बुनियादी मुद्दों और नीतियों का अध्ययन कर अपना ज्ञान बढ़ा सकें। यह देशहित में ज्यादा प्रभावी और सार्थक होगा। रावत ने राजनीति में भाषा के गिरते स्तर के विषय में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, कई बार राजनेता समाचारों में बने रहने के लिए भी हल्के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने पर वे अगले कुछ दिनों तक मीडिया की खबरों में छाये रहेंगे। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने रेखांकित किया, यह भी देखा गया है कि किसी राजनेता द्बारा अभद्र या भड़काऊ भाषा के इस्तेमाल को मीडिया तुरंत अपनी हेडलाइन बना देता है, जबकि बुनियादी मुद्दे और नीतियों को समाचारों में कई बार उतनी अहमियत नहीं दी जाती। किसी राजनेता के महज एक विवादास्पद शब्द पर मीडिया में कई-कई दिन तक बहस चलती रहती है।

रावत ने चिता जताते हुए कहा, केवल चुनावी मंचों पर ही नहीं, हमने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में भी हल्के शब्दों का इस्तेमाल होते देखा है। जन प्रतिनिधियों के इन सदनों में अब वैसी उच्चस्तरीय बहस सुनने को नहीं मिलती, जैसी एक जमाने में हुआ करती थी।(एजेंसी)

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