संतों की सुरक्षा से लेकर आश्रमों की जवाबदेही तक

-सुभाष मिश्र
आस्था के नाम पर सवाल पूछना धर्म विरोधी क्यों माना जाए? अगर किसी आश्रम में हजारों लोग जुट रहे हैं, अगर किसी संत के एक प्रवचन पर लाखों लोग पहुंच रहे हैं, अगर वहां बड़े पैमाने पर आर्थिक और सामाजिक गतिविधियां हो रही हैं और उसी परिसर में कोई दुर्घटना, मौत या सुरक्षा से जुड़ी शिकायत सामने आती है, तो सवाल पूछना जरूरी है। सवाल संत की श्रद्धा पर नहीं, व्यवस्था पर है। सवाल धर्म पर नहीं, उस व्यवस्था पर है जो धर्म के नाम पर संचालित हो रही है।
हमारे देश में आश्रम कभी एकांत के पर्याय हुआ करते थे। जंगल में कुटिया, तपस्या, अध्ययन और गुरु-शिष्य परंपरा—आश्रम की यही तस्वीर हमारी स्मृति में रही है। ऋषि-मुनि वहां साधना करते थे और शिष्य ज्ञान प्राप्त करते थे लेकिन समय बदल गया है। आज अनेक आश्रम केवल साधना के केंद्र नहीं रहे। वे विशाल आध्यात्मिक संस्थान बन चुके हैं। टीवी चैनलों से लेकर यूट्यूब और सोशल मीडिया तक संतों के प्रवचन पहुंच रहे हैं। एक लोकप्रिय संत के एक आयोजन में हजारों नहीं, लाखों लोग पहुंच सकते हैं। यानी आश्रम का स्वरूप बदल चुका है। सवाल यह है कि क्या उसके साथ सुरक्षा, प्रशासन और जवाबदेही के नियम भी बदले हैं?
यही आज का असली सवाल है।
प्रदीप मिश्रा के प्रवचन में उमड़ी भारी भीड़ से लेकर अलग-अलग संतों और कथावाचकों के आयोजनों में हुई अव्यवस्था और दुर्घटनाओं तक कई घटनाएं हमें चेताती रही हैं। वृंदावन में प्रेमानंद जी के आश्रम को लेकर हाल में उठे सवालों ने भी इस बहस को फिर सामने ला दिया है। इससे पहले अलग-अलग धर्मगुरुओं और तथाकथित आध्यात्मिक केंद्रों से जुड़े गंभीर विवाद देश देख चुका है। आसाराम और राम रहीम जैसे मामलों ने यह भी दिखाया है कि जब धार्मिक प्रभाव के साथ अपार जनसमर्थन, संसाधन और संस्थागत शक्ति जुड़ जाती है तो जवाबदेही का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है। किसी एक घटना के आधार पर किसी संत या पूरे आश्रम को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं। सोशल मीडिया पर चलने वाली अफवाह जांच का विकल्प नहीं हो सकती। आरोप को आरोप की तरह और सत्य को सत्य की तरह ही देखा जाना चाहिए। लेकिन जांच से बचने का रास्ता भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
न श्रद्धा के नाम पर जांच रुकनी चाहिए और न जांच के नाम पर श्रद्धा का अपमान होना चाहिए।
सबसे पहले संतों की सुरक्षा का सवाल है। जिन संतों के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी छोटी नहीं है। आश्रम में प्रवेश और निकास के कितने रास्ते हैं? आपात स्थिति में कितने मिनट में भीड़ बाहर निकल सकती है? आग लग जाए तो क्या होगा? अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी हो जाए तो एम्बुलेंस कितनी जल्दी पहुंच सकती है? महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए क्या व्यवस्था है?
ये सवाल किसी हादसे के बाद पूछे जाएंगे तो बहुत देर हो चुकी होगी।
बड़े आश्रमों और धार्मिक आयोजनों के लिए सरकार को अब एक स्पष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाना चाहिए। जिस आश्रम में नियमित रूप से बड़ी संख्या में लोग आते हैं, वहां समय-समय पर अग्नि सुरक्षा, भवन सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा, भीड़ क्षमता, चिकित्सा सुविधा, आपातकालीन निकासी और महिला एवं बाल सुरक्षा का ऑडिट होना चाहिए। बड़े आयोजनों के लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और आश्रम प्रबंधन के बीच पहले से समन्वय होना चाहिए।
यह धर्म के काम में सरकारी दखल नहीं होगा। यह नागरिकों की सुरक्षा का सामान्य दायित्व होगा। और सवाल केवल श्रद्धालुओं की सुरक्षा का नहीं है, संतों की सुरक्षा का भी है। जिन संतों के पास लाखों अनुयायी हैं, उनके आश्रम में आने-जाने वालों की निगरानी, निजी सुरक्षा, चिकित्सा सहायता और आपातकालीन व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। लोकप्रियता जितनी बड़ी होती जाती है, जोखिम भी उतना ही बढ़ता जाता है।
दूसरा और अधिक संवेदनशील प्रश्न आश्रम के भीतर होने वाली घटनाओं का है। किसी महिला के साथ दुव्र्यवहार की शिकायत हो, किसी व्यक्ति की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो या किसी कर्मचारी अथवा श्रद्धालु की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे तो क्या उसकी स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था है? शिकायत किसके पास जाएगी? उसकी जांच कौन करेगा? क्या पीडि़त व्यक्ति बिना भय के अपनी बात कह सकता है?
धर्मस्थल होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि वहां कानून के सामान्य सिद्धांत लागू ही न हों।
महिलाओं की सुरक्षा के मामले में तो और अधिक संवेदनशीलता की जरूरत है। किसी भी आश्रम में आने वाली महिला श्रद्धालु हो, कर्मचारी हो या स्वयंसेवक—उसकी गरिमा और सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी अन्य नागरिक की। शिकायतों को दबाना या केवल इसलिए नजरअंदाज करना कि इससे संस्था की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी, अंतत: उसी प्रतिष्ठा को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है।
तीसरा सवाल आश्रमों की आर्थिक और प्रशासनिक पारदर्शिता का है। आज कई बड़े आश्रम छोटे धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि विशाल संस्थागत ढांचे हैं। वहां दान आता है, बड़ी संख्या में लोग रहते हैं, भोजन और आवास की व्यवस्था होती है, कर्मचारी काम करते हैं और अनेक गतिविधियां चलती हैं। जब किसी संस्था का आकार इतना बड़ा हो जाए तो उसके संचालन में न्यूनतम पारदर्शिता की अपेक्षा अस्वाभाविक नहीं है। दान कहां खर्च होता है, संस्था का प्रबंधन कैसे चलता है, शिकायतों का निवारण कौन करता है, सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और किसी दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही किसकी होगी—इन सवालों का स्पष्ट ढांचा होना चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार हर आश्रम को अपने नियंत्रण में ले ले। बल्कि एक ऐसा संतुलित ढांचा चाहिए जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन सुरक्षा, कानून और नागरिक अधिकारों से समझौता न हो।
असल में हमें यह समझना होगा कि आस्था निजी हो सकती है, लेकिन जब आस्था का सार्वजनिक विस्तार हजारों-लाखों लोगों को एक जगह ले आता है तो उसकी व्यवस्था सार्वजनिक जिम्मेदारी का विषय बन जाती है। आज प्रचार तंत्र ने संतों और आश्रमों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। पहले आश्रम तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु को यात्रा करनी पड़ती थी। अब मोबाइल की स्क्रीन पर प्रवचन पहुंचता है और उसी स्क्रीन से अगले आयोजन में पहुंचने की अपील भी। लोकप्रियता की यह गति जितनी तेज है, व्यवस्था की तैयारी भी उतनी ही तेज होनी चाहिए।
किसी संत के अनुयायियों की संख्या अब केवल धार्मिक प्रभाव का पैमाना नहीं है। वह सुरक्षा की जिम्मेदारी का भी संकेत है। जिस व्यक्ति के एक संदेश पर लाखों लोग एकत्र हो सकते हैं, उसके आयोजन को सामान्य निजी कार्यक्रम की तरह नहीं देखा जा सकता। यहीं प्रशासन को भी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी। किसी संत की लोकप्रियता प्रशासनिक विशेषाधिकार का आधार नहीं बन सकती और किसी आश्रम की धार्मिक पहचान उसे सामान्य कानूनों से ऊपर नहीं रख सकती। प्रशासन का काम धर्म में हस्तक्षेप करना नहीं, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। साथ ही समाज को भी दो अतियों से बचना होगा। एक तरफ हर सवाल को धर्म विरोधी बताकर दबा देना और दूसरी तरफ हर धार्मिक संस्था को संदेह की नजर से देखना—दोनों गलत है। संतों की परंपरा का सम्मान जरूरी है, लेकिन सम्मान का अर्थ सवालों पर प्रतिबंध नहीं हो सकता।
हमारे यहां संत परंपरा ने समाज को सवाल पूछना सिखाया है। कबीर ने रूढिय़ों को चुनौती दी, विवेकानंद ने समाज को आत्मविश्वास दिया और अनेक संतों ने धर्म को मनुष्य की सेवा से जोड़ा। इसलिए किसी आश्रम की व्यवस्था पर सवाल उठाना अपने आप में धर्म विरोधी कैसे हो सकता है? धर्म को बचाने के लिए सवालों को दबाने की नहीं, सवालों का जवाब देने की जरूरत है।
आश्रमों को संदेह का केंद्र बनाना किसी का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। लेकिन आश्रमों को सवालों से मुक्त क्षेत्र मान लेना भी ठीक नहीं। संत की गरिमा जांच से नहीं घटती, बल्कि निष्पक्ष जांच से और मजबूत होती है। आश्रम की प्रतिष्ठा पारदर्शिता से कम नहीं होती, बल्कि पारदर्शिता ही उसे संदेह से बचाती है।
अब समय आ गया है कि सरकारें और समाज इस बदलते आश्रम-संस्कृति को पुराने नजरिए से देखना बंद करें। जहां कभी कुछ साधक बैठते थे, वहां आज हजारों-लाखों की भीड़ पहुंच रही है। जहां कभी कुटिया थी, वहां अब बड़े परिसर और संस्थान हैं। जब स्वरूप बदल गया है तो सुरक्षा और जवाबदेही का ढांचा भी बदलना होगा। बड़े आश्रमों और बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए देश में एक स्पष्ट और समान सुरक्षा नीति होनी चाहिए। इसमें भवन और अग्नि सुरक्षा, भीड़ की क्षमता, चिकित्सा सुविधा, आपातकालीन निकासी, महिला एवं बाल सुरक्षा, शिकायत निवारण और प्रशासन के साथ समन्वय जैसे न्यूनतम मानक तय किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि उस स्वतंत्रता के बीच नागरिकों के जीवन और गरिमा की रक्षा करना होना चाहिए।
संतों को सुरक्षा चाहिए, श्रद्धालुओं को सुरक्षा चाहिए और आश्रमों को जवाबदेही। इन तीनों में से किसी एक को भी धर्म के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आस्था इतनी कमजोर नहीं कि कुछ सवालों से टूट जाए। धर्म इतना असुरक्षित नहीं कि पारदर्शिता से उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाए। बल्कि मजबूत आस्था वही है जो सवालों का सामना कर सके और मजबूत संस्था वही है जो जांच के सामने खड़ी रह सके।
इसलिए अब वक्त है कि देश साफ शब्दों में तय करें आश्रम श्रद्धा के केंद्र हो सकते हैं, लेकिन वे कानून और जवाबदेही से बाहर नहीं हो सकते। आस्था का सम्मान होगा, मगर सुरक्षा की कीमत पर नहीं; संतों की गरिमा रहेगी, मगर जवाबदेही की कीमत पर नहीं। क्योंकि श्रद्धा सिर झुका सकती है, लेकिन नागरिक अधिकारों को आंखें बंद करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और यही बात सबसे साफ शब्दों में कहने की जरूरत है सवाल पूछना धर्म के खिलाफ नहीं है। सवालों से बचना, कई बार, धर्म के नाम पर खड़ी व्यवस्था के खिलाफ जरूर जाता है।


