वोटर के मन की बात और चुनावी सर्वे

सुभाष मिश्र
जिस मतदाता को कभी सर्वे में बोलना पसंद था, आज वही मतदाता अपना मन पढ़ने वालों को भी पढ़ रहा है। चुनावी सर्वे करने वाले सवाल पूछते हैं, मतदाता मुस्कुराता है; पत्रकार जवाब तलाशता है, मतदाता चुप हो जाता है। क्योंकि उसे अब मालूम है कि उसके जवाब का इस्तेमाल सिर्फ उसकी राय जानने के लिए नहीं, बल्कि राय बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यही बदलता हुआ मतदाता भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प कहानी है।
एक समय था जब चुनावी सर्वे चुनाव का आईना हुआ करते थे। अखबारों और बाद में टेलीविजन चैनलों की टीमें गांव-गांव, शहर-शहर जाती थीं। लोग खुलकर अपनी पसंद बताते थे, राजनीतिक झुकाव बताते थे, नाराजगी बताते थे और उम्मीदें भी बताते थे। पत्रकार जनता की नब्ज टटोलते थे और उनके पास जमीन की खबर होती थी। कुछ अखबारों, पत्रिकाओं और चैनलों के सर्वे इतने विश्वसनीय माने जाते थे कि राजनीतिक दल ही नहीं, आम मतदाता भी उनके परिणामों का इंतजार करता था।
सर्वे की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता थी और उसकी विश्वसनीयता का आधार था—स्वतंत्रता। फिर चुनाव महज जनमत का उत्सव नहीं रहे, वे एक बड़ा प्रबंधन बनते गए। राजनीतिक दलों ने चुनावी सर्वे को रणनीति का औजार समझना शुरू किया। सर्वे के लिए अलग बजट बनने लगा और धीरे-धीरे यह बजट भी बड़ा होता गया। सर्वे प्रायोजित होने लगे। मीडिया संस्थानों और सर्वे एजेंसियों पर सवाल उठने लगे कि वे जनता की राय बता रहे हैं या किसी खास राजनीतिक रणनीति के लिए माहौल तैयार कर रहे हैं।कुछ समय तक पुरानी विश्वसनीयता के सहारे यह सिलसिला चलता रहा, लेकिन जनता को बहुत लंबे समय तक भ्रम में नहीं रखा जा सकता। जिस दिन मतदाता को यह समझ में आने लगा कि सर्वे भी खरीदे जा सकते हैं, उस दिन सर्वे के आंकड़ों से ज्यादा उनके पीछे का सवाल महत्वपूर्ण हो गया—यह सर्वे किसने कराया है और क्यों कराया है? यहीं से मतदाता बदलने लगा।
आज का मतदाता पहले से कहीं ज्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक है। वह केवल भाषण नहीं सुनता, भाषण और काम के बीच का अंतर भी देखता है। वह सोशल मीडिया पर किसी नेता की लोकप्रियता देखकर यह मान लेने को तैयार नहीं कि वही लोकप्रियता मतदान केंद्र तक भी जाएगी। वह जानता है कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाया जा सकता है, भीड़ दिखाई जा सकती है और माहौल पैदा किया जा सकता है। लेकिन मतदाता का वास्तविक मन पढ़ना अब भी आसान नहीं है। बल्कि एक अर्थ में पहले से ज्यादा कठिन हो गया है।
आज आदमी अपनी पसंद सोशल मीडिया पर लिखता जरूर है, लेकिन हर बात नहीं लिखता। वह अपनी राजनीतिक पहचान सार्वजनिक करने में भी सावधान है। सर्वे करने वाला उसके घर तक पहुंच जाए तो वह परिस्थिति देखकर जवाब देता है। कई बार वह वही कह देता है जो उस समय कहना सुविधाजनक हो। यानी जितना मतदाता बोलता है, उससे कहीं अधिक वह छिपाता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक पद्धति से किए गए सर्वे भी कई बार चुनाव परिणाम के आसपास नहीं पहुंच पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि वैज्ञानिक सर्वेक्षणों का कोई मूल्य नहीं है। सही नमूना, सही पद्धति और स्वतंत्र प्रक्रिया से किया गया सर्वे चुनावी रुझान समझने का उपयोगी माध्यम हो सकता है। लेकिन किसी भी सर्वे को चुनाव परिणाम का अंतिम सत्य मान लेना जोखिम भरा है। क्योंकि चुनावी राजनीति में आंकड़ों के साथ मनोविज्ञान भी चलता है और मनोविज्ञान में सबसे कठिन चीज है—चुप्पी को पढ़ना।
आज राजनीतिक दल सर्वे के आधार पर घोषणापत्र तैयार करते हैं। कौन-सा मुद्दा जनता को प्रभावित कर रहा है, कौन-सा वर्ग नाराज है, कौन-सी घोषणा लोकप्रिय हो सकती है—इन सबकी जानकारी जुटाई जाती है। यह लोकतांत्रिक राजनीति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन यदि इन निष्कर्षों का आधार ही ऐसे सर्वे हों जिनमें मतदाता ने अपना वास्तविक मन नहीं बताया, तो रणनीति भी गलत दिशा में जा सकती है। सोशल मीडिया ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। अब वास्तविक जनमत और प्रचारित जनमत के बीच अंतर करना आसान नहीं है। कोई बात वायरल है, इसका मतलब यह नहीं कि वह बहुसंख्यक मतदाता की राय है। कोई मुद्दा सोशल मीडिया पर दिखाई नहीं दे रहा, इसका मतलब यह भी नहीं कि वह लोगों के मन में नहीं है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मतदाता अब केवल चुनावी भाषण सुनने वाला दर्शक नहीं है। वह पिछले चुनाव के वादे याद रखता है। वह सरकार का काम देखता है। वह विपक्ष की भूमिका देखता है। वह अपने आसपास के बदलाव को महसूस करता है। वह परिवार और समाज की बातचीत सुनता है। और सबसे महत्वपूर्ण—वह अपने निर्णय को आखिरी क्षण तक अपने भीतर रख सकता है।
एक ही कहानी बार-बार सुनाकर बच्चों को बहलाया जा सकता है, जनता को नहीं। जनता अब इतनी भोली नहीं कि हर सर्वे को सच मान ले और हर नारे को अपना विचार बना ले। इसलिए चुनावी राजनीति के पुराने औजार अब उतने धारदार नहीं रहे। सिर्फ सर्वे खरीद लेने से जनता नहीं खरीदी जा सकती। सोशल मीडिया पर ट्रेंड करा देने से मतदाता की उंगली की दिशा तय नहीं की जा सकती। बड़े-बड़े नारे भी उस सवाल का जवाब नहीं बन सकते जो मतदाता अपने मन में लेकर मतदान केंद्र तक जाता है। वास्तविक सर्वे शायद वही है जो मतदाता अपने मन में करता है।
राजनीतिक दल जितनी जल्दी यह समझ लें कि जनता को प्रभावित करने से पहले उसे समझना जरूरी है, उतना ही बेहतर होगा। जनता को बहलाने की राजनीति की उम्र सीमित है। भरोसे की राजनीति की उम्र लंबी होती है। क्योंकि मतदाता सर्वे में कुछ भी कहे, कैमरे के सामने चुप रहे या सोशल मीडिया पर अपनी राय छिपा ले—मतदान के दिन उसकी उंगली किसी सर्वे एजेंसी से नहीं पूछती कि किसके पक्ष में जाना है। वह सीधे लोकतंत्र की मशीन पर अपना मन दर्ज करती है। और यही वजह है कि चुनाव का सबसे विश्वसनीय सर्वे आज भी वही है—जो चुनाव के बाद सामने आता है।



