ऐसी घाेर लापरवाही, पेड़ और फ्लेक्स से हाे रही बिजली गुल - realtimes
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ऐसी घाेर लापरवाही, पेड़ और फ्लेक्स से हाे रही बिजली गुल

रायपुर(realtimes) पावर कंपनी के साथ विज्ञापन लगाने वालाें की घाेर लापरवाही का खामियाजा आम जनता काे उठाना पड़ रहा है। राजधानी रायपुर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां पर बिजली के तार पेड़ों से घिरे न हों। सैकड़ों स्थानों पर यही नजारा दिखता है। इसी के साथ पूरे शहर में बड़े-बड़े फ्लेक्स हैं जो बिजली के तारों के आस-पास लगे हुए हैं। इन पेड़ों और फ्लेक्स के कारण बिजली उपभोक्ता की आफत आ गई है। इसकी वजह से लगातार बिजली गुल हाे रही है। एक ही इलाके में कई-कई बार बिजली गुल होना आम हो गया है। एक बार बिजली गई तो कब आएगी कोई बताने वाला भी नहीं रहता है। पावर कंपनी के पास लंबे समय से अपने अमले का टोटा है। सारा काम ठेके पर चल रहा है। ठेके में काम करने वालों के पास जहां अनुभव की कमी है, वहीं उनकी क्षमता भी उस तरह की नहीं है जैसी पुराने बिजली विभाग के कर्मचारियों में होती थी।
मानसून में बारिश होने पर बिजली का गुल होना कोई नया नहीं है, लेकिन राजधानीवासी इन दिनों यह महसूस कर रहे हैं कि बिजली तो पहले भी मानसून में गुल होती थी, लेकिन इस बार बिजली कुछ ज्यादा ही गुल हो रही है। हालांकि पॉवर कंपनी के अधिकारी यह नहीं मानते हैं कि बिजली ज्यादा गुल हो रही है, लेकिन यह जरूरत मानते हैं कि संभव है किसी एक इलाके में किसी कारण से ऐसा हो रहा हो।
नहीं काटते हैं पेड़
जब बार-बार बिजली गुल होने के कारण की पड़ताल की तो जो बातें सामने आई है, उनमें सबसे अहम कारण पेड़ों का बिजली के तारों पर गिरना है। बिजली के तारों पर पेड़ों का गिरना भी नया नहीं है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी लापरवाही यह है कि राजधानी के हर हिस्से में जहां भी पेड़ लगे हैं, वहां पर ज्यादातर स्थानों पर बिजली के तार इन पेड़ों से घिरे हुए हैं। तारों को पेड़ों से मुक्त करने का काम पॉवर कंपनी का अमला करता जरूर है, लेकिन यह काम तभी होती है, जब कहीं से शिकायत आती है, या फिर महज खानापूर्ति के लिए यह काम कर दिया जाता है। लेकिन जितनी संख्या में बिजली के तार पेड़ों से घिरे हुए हैं, उसकी तुलना में इनको मुक्त करने का काम आधा क्या 30 फीसदी भी नहीं होता है। राजधानी के किसी भी रास्ते पर निकल जाए और एक नजर उठाकर पेड़ों की तरफ देखें तो मालूम होगा कि जहां भी पेड़ हैं, वहां पर बिजली के तारों के उपर ही पेड़ों की डालियां लटक रही हैं। इसी के साथ शहर में बड़े-बड़े कपड़ों के फ्लैक्स लटके हुए हैं, थोड़ी सी हवा चलने की देर नहीं कि ये फटने के बाद उड़कर सीधे बिजली के तारों पर गिरते हैं। इनके गिरते ही बिजली गुल हो जाती है। इसी के साथ पेड़ों के भी बिजली के तारों पर गिरने से बिजली गुल होती है। पावर कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक पेड़ और फ्लैक्स न सिर्फ 11 केवी, बल्कि 33 केवी के तारों पर भी लगातार गिर रहे हैं जिसके कारण बिजली गुल हो रही है।
ठेके पर काम करने वाले अनुभवहीन
पावर कंपनी से जुड़े पुराने अधिकारी बताते हैं, लंबे समय से पावर कंपनी में मैदानी काम के लिए अपने कर्मचारी हैं ही नहीं। सारा काम इस समय ठेके पर चल रहा है। ठेके में काम करने वालों के पास जहां अनुभव की कमी है, वहीं इनकी क्षमता भी उतनी नहीं है जितनी पॉवर कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों की रहती थी। यही वजह है कि एक बार बिजली गुल होने के बाद इसको ठीक करने में लंबा समय लग जाता है।
अमला भी लाठी टेक
कहने काे राजधानी में स्कॉडा लगाया गया है जिसका काम बिजली गुल होने पर बिजली में कहां खराबी है, उनका पता लगाकर अमले को बताना है, लेकिन ज्यादातर स्थानों पर बिजली गुल होने पर खराबी खोजने के लिए अमला निकलता है तो उसे खराबी खोजने में घंटों लग जाते हैं। अमला लाठी टेक होने के कारण ही बिजली की खराबी को खोज कर ठीक करने में ज्यादा समय लग जाता है। कहीं पर एक इंसुलेटर खराब होने पर उस स्थान को खोजना भूसे में सुई खोजने जैसा है। किसी ने फोन करके बता दिया कि यहां से चिंगारी निकली थी तो काम आसान हो जाता है, कहीं से फोन नहीं आया तो काम कठिन हो जाता है।
शिकायत केंद्रों का बुरा हाल
बिजली गुल होने पर शिकायत करने के लिए जब उपभोक्ता शिकायत केंद्रों में फोन करते हैं तो ज्यादातर फोन बिजी मिलता है। कहने को यही कहा जाता है, लगातार फोन आने के कारण फोन बिजी रहता है, लेकिन आम तौर पर लगातार फोन आने के कारण फोन उठाकर रख दिया जाता है। शिकायत केंद्रों में भी ठेका कर्मचारी बैठते हैं। सेंट्रल शिकायत केंद्र में कई बार फोन नहीं लगता है।

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