ई-पोर्टल से मिलेगा खाद, छत्तीसगढ़ के बीजापुर और गरियाबंद बने पायलट जिले - realtimes
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ई-पोर्टल से मिलेगा खाद, छत्तीसगढ़ के बीजापुर और गरियाबंद बने पायलट जिले

रायपुर।

केंद्र सरकार ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों के वितरण को अधिक पारदर्शी और जरूरत आधारित बनाने के लिए नई डिजिटल व्यवस्था लागू करने की शुरुआत की है। इस नई प्रणाली के पायलट प्रोजेक्ट के लिए छत्तीसगढ़ के दो जिलों—बीजापुर और गरियाबंद—का चयन किया गया है। खरीफ सीजन के दौरान इन जिलों में किसानों को उर्वरक वितरण ई-पोर्टल के माध्यम से किया जाएगा, जिससे खाद की उपलब्धता, वितरण और खपत की निगरानी रियल टाइम में की जा सकेगी।

नई व्यवस्था ऐसे समय लागू की जा रही है जब हर वर्ष खरीफ सीजन में खाद की कमी, लंबी कतारों, कालाबाजारी और जरूरत से अधिक खरीदारी की शिकायतें सामने आती रही हैं। केंद्र सरकार का मानना है कि डिजिटल प्रणाली से इन समस्याओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।

क्या है नई व्यवस्था?

नई प्रणाली के तहत किसानों को उर्वरक प्राप्त करने के लिए पहले पोर्टल पर पंजीयन कराना होगा। किसान अपनी फसल, भूमि और आवश्यक उर्वरक की जानकारी दर्ज करेंगे। इसके आधार पर उन्हें उर्वरक आवंटित किया जाएगा। कई राज्यों में परीक्षण के दौरान ई-टोकन, क्यूआर कोड और भूमि रिकॉर्ड आधारित सत्यापन जैसी व्यवस्थाएं भी अपनाई गई हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी वाला उर्वरक वास्तविक किसानों तक पहुंचे और उसकी अनावश्यक जमाखोरी न हो।

बीजापुर और गरियाबंद क्यों महत्वपूर्ण?

बीजापुर और गरियाबंद का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों जिलों की कृषि परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। बीजापुर नक्सल प्रभावित और आदिवासी बहुल जिला है, जबकि गरियाबंद में धान उत्पादन प्रमुख है। ऐसे में केंद्र सरकार को यह समझने का अवसर मिलेगा कि डिजिटल उर्वरक वितरण प्रणाली दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों और सामान्य कृषि क्षेत्रों में किस तरह काम करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन दोनों जिलों में प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में इसे पूरे छत्तीसगढ़ और देश के अन्य राज्यों में लागू किया जा सकता है।

खाद संकट और कालाबाजारी रोकने की कोशिश

केंद्र सरकार का दावा है कि नई प्रणाली से उर्वरक की उपलब्धता और स्टॉक की निगरानी आसान होगी। अधिकारी यह देख सकेंगे कि किस जिले, ब्लॉक या दुकान में कितना स्टॉक उपलब्ध है और किस किसान ने कितना उर्वरक खरीदा है। इससे कालाबाजारी, फर्जी बिक्री और औद्योगिक उपयोग के लिए उर्वरक की अवैध निकासी पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

किसानों की चिंता भी कम नहीं

हालांकि नई व्यवस्था को लेकर किसानों और सहकारी समितियों के बीच कुछ आशंकाएं भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल साक्षरता और समय पर पंजीयन जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। मध्य प्रदेश में लागू की गई इसी तरह की डिजिटल प्रणाली से कतारें कम होने और वितरण में पारदर्शिता बढ़ने के दावे किए गए हैं, लेकिन शुरुआती दौर में किसानों को नई प्रक्रिया समझने में समय लगा था।

खरीफ सीजन में होगी असली परीक्षा

छत्तीसगढ़ में धान की बुआई का मौसम शुरू होने वाला है और इसी दौरान उर्वरकों की मांग सबसे अधिक रहती है। ऐसे में बीजापुर और गरियाबंद में शुरू की जा रही ई-पोर्टल आधारित व्यवस्था की सफलता या विफलता पर राज्य और केंद्र दोनों की नजर रहेगी। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो खाद वितरण की पारंपरिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, केंद्र सरकार उर्वरक वितरण को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाकर “जरूरत के अनुसार खाद, सही किसान तक खाद” की व्यवस्था विकसित करना चाहती है। अब यह देखना होगा कि छत्तीसगढ़ के दोनों पायलट जिले इस नई व्यवस्था की पहली परीक्षा में कितना सफल साबित होते है।

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